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नापासर की मटकियों की ठंडक बाहर भी

नापासर की मटकियों की ठंडक बाहर भी

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नापासर की मटकियों की ठंडक बाहर भी

नापासर की मटकियों की ठंडक बाहर भी

बीकानेर. चाक पर मिट्टी से आकर बनाकर थापी से उसको थाप कर तैयार होती मटकियां। यह नजारा है शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित नापासर कस्बे का। जहां बनने वाली इन मटकियों की मांग बीकानेर ही नही बल्कि प्रदेश के कई जिलों में रहती है।
यहां ऑफ सीजन में बड़ी संख्या में मटकियां बनाई जाती हैं। जिसे गर्मी के सीजन में बिक्री की जाती है। लोग बताते है कि बाहर से आने वाले लोग यहां की मटकियों की मांग जरूर करते हैं। यहां बनने वाली मटकी में पानी ठंडा रहता है। नापासर में 15 से 20 घरों में मटकियां बनाने का काम हो रहा है। यहां करीब 4 से 5 तरह की मटकियों को तैयार करके बेचा जा रहा है।


यह है कीमत
छोटी मटकी 35 से 40
मीडियम मटकी 70 से 80 रुपए
बड़ी मटकी 160 से 190


कई जगहों पर जाती है
जगदीश प्रसाद ने बताया कि नापासर से कई जिलों में मटकियां भेजी जाती है। व्यापारी वहां से अन्य स्थानों पर भी भेजते हैं। यहां से मटकियां सबसे ज्यादा राजगढ़, चूरू, फतेहपुर, झुंझुनूं व सीकर जिलों में भेजी जाती है। उन्होंने बताया कि इस काम में चौथी पीढ़ी लगी हुई है। करीब 70 सालों से मटकियां बनाने का ही काम कर रहे है। अब छोटा बेटा भी पढ़ाई के साथ-साथ इस काम में जुट गया है।


ऐसे बनती है मटकी
मटकियों को तैयार करने वाले कारीगर बताते हंै कि नापासर में करीब 15 से 20 घरों में मटकियां बनाने का काम किया जाता है। इसको बनाने के लिए तीन प्रकार की मिट्टी कोलायत, लखासर और नापासर को मिक्स करके उसको चाक पर रखते है और उसको आकार दिया जाता है उसके बाद थापी से थापा जाता है उसके बाद उसको सूखने के लिए मिट्टी में 2 से 3 दिन रखते है फिर आग में पकाया जाता है उसके बाद
मटकी तैयार होती है एक मटकी को तैयार होने में 3 से 4 दिन लगते है।

अब इलेक्ट्रॉनिक चाक पर बना रहे
इससे जुड़े लोगों ने बताया कि समय के साथ-साथ इस काम में भी बदलाव आया है। पहले हाथ से चाक को चलाकर मटकियां बनाते थे, लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक चाक का इस्तेमाल कर रहे है। इससे समय की भी बचत हो रही है। पहले एक दिन में 10 से 11 मटकी बनती थी और अब 14 से 15 मटकी रोजाना बना रहे हैं।