28 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बीकानेर

सुरक्षा के कड़े पहरे में रहती है चांदमल ढड्ढा की गणगौर

चांदमल ढ़ड्ढा की गणगौर- दशकों से चौक से बाहर नहीं निकली  

Google source verification

बीकानेर में रियासतकाल से गणगौर पूजन का स्वर्णिम इतिहास रहा है। होलिका दहन के दूसरे दिन से प्रारंभ होने वाले गणगौर पूजन उत्सव के दौरान पूरा शहर गणगौर पूजन के विविध रंगों से सराबोर रहता है। नन्ही-नन्ही बालिकाएं जहां सोलह दिवसीय पूजन अनुष्ठान करती है, वहीं पूर्व बीकानेर राज परिवार की गणगौर शाही लवाजमें के साथ सवारी जूनागढ़ की जनाना ड्योढ़ी से तीज व चतुर्थी को निकालने की परंपरा है। चौतीना कुआ से गणगौर दौड़ होती है। चैत्र शुक्ल तृतीया व चतुर्थी के दिन ढड्ढा चौक में चांदमल ढड्ढा की प्राचीन गणगौर का मेला भरता है। इस गणगौर के प्रति शहरवासियों की विशेष आस्था और श्रद्धा है। नख से शिख तक स्वर्ण आभूषणों से श्रृंगारित रहने वाली इस गणगौर के दर्शन-पूजन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु हर साल ढड्ढा चौक पहुंचते है।

 

दशकों से हो रहा पूजनबीकानेर रियासत के समय से ढड्ढा चौक में इस गणगौर प्रतिमा का पूजन हो रहा है व मेला भर रहा है।चांदमल ढड्ढा परिवार के सदस्य नरेन्द्र कुमार ढड्ढा के अनुसार करीब 140 साल से अधिक समय से यहां मेला भर रहा है। हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां गवरजा और भाईया के दर्शन के लिए आते है।

दशकों से चौक से बाहर नहीं निकली

चांदमल ढड्ढा की गणगौर प्रतिमा हवेली में विराजित रहती है। मेला आयोजन से जुड़े यशवंत कोठारी के अनुसार चैत्र शुक्ल द्वितीया को गणगौर प्रतिमा का श्रृंगार किया जाता है।तृतीया व चतुर्थी को शाम से रात तक गणगौर प्रतिमा चौक में विराजित की जाती है। कोठारी के अनुसार दशकों से यह प्रतिमा ढड्ढा चौक से बाहर नहीं निकली है। इस प्रतिमा को न पानी पिलाने के लिए और ना ही खोळा भरवाने के लिए चौक से बाहर लेकर जाते है।

नख से शिख तक बेशकीमती आभूषण

चांदमल ढड्ढा की गणगौर अपने बेशकीमती हीरा, पन्ना, माणक, मोती, कुंदन से जडि़त स्वर्ण आभूषणों के कारण प्रसिद्ध है।गणगौर प्रतिमा को स्वर्ण आभूषणों से श्रृंगारित करने में घंटो लगते है। गणगौर प्रतिमा बोरिया, कंठी, हार, बाजूबंद, हथफूल, कंदोला, कमरबंद, नथ, मटरिया, झुमका,टीका, पायल सहित कई प्रकार के आभूषणों से श्रृंगारित किया जाता है। कई प्रकार के हार और कई कंदोला धारण किए रहती है यह गणगौर प्रतिमा।

48 घंटे तक पुख्ता सुरक्षा घेरा

चांदमल ढड्ढा की गणगौर बेशकीमती आभूषणों से श्रृंगारित रहने के कारण हथियारबंद पुलिस के सुरक्षा घेरे में रहती है। यशवंत कोठारी के अनुसार हवेली के अंदर व चौक में विराजित रहने के दौरान गणगौर प्रतिमा पूरे 48 घंटे सुरक्षा के कड़े घेरे में रहती है।

भाईया के प्रति अटूट आस्थाचांदमल ढड्ढा की गणगौर प्रतिमा के साथ भाईया की छोटी प्रतिमा भी विराजित रहती है। भाईया की प्रतिमा भी स्वर्ण आभूषणों से श्रृंगारित रहती है। महिलाओं में इस भाईया के प्रति भी अटूट आस्था व श्रद्धा का भाव रहता है।

प्रतिमा के आगे मनमोहक घूमर

चांदमल ढड्ढा की गणगौर प्रतिमा के आगे बालिकाएं व महिलाएं श्रद्धाभाव के साथ घूमर नृत्य करती है। पारंपरिक ढोल, झालर और कांसी की थाली की कर्णप्रिय संगत के बीच निकलने वाली ध्वनि पर शाम से रात तक अनवरत रुप से घूमर नृत्य चलता रहता है। महिलाओं में गणगौर प्रतिमा के आगे नृत्य करने की होड सी मची रहती है।

हवेली में पहला पूजन

चांदमल ढड्ढा की प्राचीन गणगौर प्रतिमा का पहला पूजन ढड्ढा हवेली में होता है। महिलाएं मां गवरजा का पूजन कर प्रतिमा के आगे नृत्य करती है। शुक्रवार को राजेन्द्र ढड्ढा, नरेन्द्र कुमार ढड्ढा, यशवंत कोठारी, अनुराग कोठारी, नीता गोलिया, संतोष ढड्ढा, रीटा बांठिया, मृदुला सुराणा, सुनीता कोठारी, वैणी कोठारी आदि ने पूजन किया। ढड्ढा परिवार की वरिष्ठतम सदस्या 90 वर्षीया छोटा देवी ने गणगौर पूजन किया।

बड़ी खबरें

View All

बीकानेर

राजस्थान न्यूज़