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बीकानेर स्थापना दिवस विशेष: रियासतकाल के साक्षी रहे कुछ लोगों से ली गई उस दौर की स्मृतियां….

देश की आजादी से पहले राजा-महाराजाओं के राज के साक्षी रहे लोग आज भी उस दौर को याद कर रोमांचित हो उठते हैं।

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Bikaner Raising Day

बीकानेर स्थापना दिवस

बीकानेर . देश की आजादी से पहले राजा-महाराजाओं के राज के साक्षी रहे लोग आज भी उस दौर को याद कर रोमांचित हो उठते हैं। रियासतकाल की बात करते ही ये पुरानी स्मृतियों में खो जाते हैं। ये बुजुर्ग बताते हैं कि शासन के अनुसार राजा-महाराजाओं का दौर आज से अच्छा था। लोगों में राज का भय था। लोग अनुशासित थे। आपसी प्रेम-भाईचारा देखते ही बनता था। लोग एक दूसरे के सुख-दुख में काम आते थे।

फिजुलखर्ची और दिखावा नहीं था। लोग सीधे और सरल थे। पहनावा साधारण था व परम्पराओं से जुड़े थे। मोटा खाना और मोटा कपड़ा पहनना था। कुए, तालाब और बावड़ी ही पानी के एकमात्र साधन थे। बैलगाड़ी और ऊंटगाड़ा आवागमन के साधन थे। नकद राशि भले ही कम हो लेकिन सोने-चांदी के आभूषणों की कमी नहीं थी। लोग संतोषी प्रवृति के थे। महिलाओं की इज्जत थी। घी, दूध और छाछ की प्रचुरता थी।

रियासतकाल के साक्षी रहे कुछ लोगों से ली गई उस दौर की स्मृतियां....

उस दौर में होती थी सुनवाई, नहीं थी बदमाशी
रियासतकाल को याद कर 92 वर्षीय हाजी अब्दुल हमीद पुरानी यादों में खो गए। वे बताते हैं राज तो राजाओ का था। उस दौर में आमजन की सुनवाई होती थी। महाराजा स्वयं प्रजा का ध्यान रखते थे। राज का भय इतना था कि बदमाश प्रवृत्ति के लोग भयभीत रहते थे। लोग साधारण थे।

आपसी प्रेम-सौहार्द अधिक था। दिखावा कम था। लोग एक-दूसरे का ध्यान रखते थे। महाराजा स्वयं रात को गश्त पर निकलते थे। मेले-मगरियों में लोग बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। महिलाओं की अधिक इज्जत थी। रात को 12 बजते ही परकोटे के सभी गेट और बारिया बंद हो जाते थे।

राब-खीचड़ा प्रमुख
रियासतकाल को याद कर मोहिनी देवी उस दौर को आज से कही अधिक अच्छा बताती है। सौ वर्ष से अधिक आयु पार कर चुकी मोहिनी देवी बताती है कि उस दौर में महिलाओं की अधिक इज्जत थी। महिलाएं घर के कार्यो में ही व्यस्त रहती थी। घटी, सिला लोढी और उंखळी से ही अनाज और मसाले पीसे जाते थे। छाछ, खारी राब, बाजरे व मूंग का खीचड़ा, बाटा, कैर, सांगरी और ग्वरपाठे की सब्जी प्रमुख थी।

बाड़ों में अखाड़े, जुबान के थे पक्के
रियासतकाल को याद कर उस दौर की स्मृतियों में खोते हुए सूरजकरण छंगाणी बताते है कि भले ही वह दौर राजाओं के राज का था लेकिन उस समय का आपसी प्रेम, सौहार्द, एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होना, जो बात कह दी उस पर कायम रहना लाजवाब थी। लोगों में पहलवानी का जुनून था। घरों के पास बने बाड़ो में अखाड़े थे। लोग प्रीत निभाने वाले थे। गली-मोहल्लों में बच्चे पारम्परिक खेलों में व्यस्त रहते थे।

ग्रामीण जब भी शहर में आते समूह रूप में आते थे। बैल गाडिय़ों व ऊंटों पर सवार होकर आते थे। खुले स्थानों पर एक साथ ठहरते थे। पहनावा बहुत साधारण था। मनोरंजन में रम्मते, मेले-मगरिये और पारम्परिक खेल ही थे। बरसात में तालाबों के भर जाने पर गोठो और गंठो के दौर चलते थे। रौनक देखते ही बनती थी।

लोग थे संतोषी
रियासतकाल को याद करते हुए 90 वर्षीय कन्हैया लाल ओझा (घेटड़ महाराज) बताते है कि उस समय सभी वस्तुएं सस्ती थी। लोग संतोषी प्रवृति के थे। शहर सुन्दर व मोहल्ले भयमुक्त थे। बहन-बेेटियों की इज्जत थी। भाषा में शालीनता और सभी धर्म-जातियों में आपसी सौहार्द था। लोग एक दूसरे के सुख-दुख में काम आते थे। निश्चित समय पर ही परकोटे के गेट खुलते और बंद होते थे।

नकद राशि कम परन्तु सोना-चांदी अधिक था।सड़कें कच्ची और रेत वाली थी। चारों और जगह-जगह राज के सैनिक दिखाई देते थे। कुएं और तालाब ही पानी के एकमात्र साधन थे। बैलगाड़ी और ऊंट गाडे ही परिवहन के साधन थे। बैलों के गलों में बंधे घंटियों की रूण झुण की मिठास आज भी याद है।