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चेतन हुए धूणे, देर रात तक चर्चाओं के साथ खान-पान के दौर

सर्दी बढऩे के साथ ही पुराने शहर में पारंपरिक अलाव तापने के साथ हथाई के दौर शुरू हो गए हैं। शहर में कई जगह ऐसे धूणे भी चेतन हुए हैं, जिन पर रात भर लोग जुटते हैं। हथाई में सामाजिक, राजनीतिक और स्थानीय मुद्दों पर मंथन के साथ किस्से-कहानियों से शिक्षा और संस्कार की परिपाटी को आगे बढ़ाया जा रहा है।
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बीकानेर

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Atul Acharya

•

Updated: 1 Dec 2021, 6:24 PM IST

चेतन हुए धूणे, देर रात तक चर्चाओं के साथ खान-पान के दौर

चेतन हुए धूणे, देर रात तक चर्चाओं के साथ खान-पान के दौर

-विमल छंगाणी

बीकानेर. धूणे शहर की संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। सर्दियों में गली-मोहल्लों से चौक-चौराहों और मोहल्लों तक देर शाम से रात तक यहां लोगों की उपस्थिति बनी रहती है। धूणे सर्दी से बचाव के लिए अलाव तापने के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सहित स्थानीय मुद्दों पर चर्चा के केन्द्र भी रहते हैं। किस्से-कहानियों के माध्यम से युवाओं को शिक्षा और संस्कार देने की बाते भी धूणों पर चलती हैं। इनमें युवाओं से बुजुर्ग तक शामिल होते हैं व सौहाद्र्रपूर्ण चर्चाओं का हिस्सा बनते हैं। धूणे उस गली, मोहल्ले और चौक की पहचान होने के साथ-साथ एकता, प्रेम और भाईचारा के प्रतीक भी हैं। सर्द रातों में गली -मोहल्लों में आने-जाने वालों पर नजर भी रहती है। वहीं आपसी चर्चाओं के दौरान आए दिन यहां खान-पान के दौर भी चलते रहते हैं।


मोहल्लों की पहचान हैं धूणे
शहर में कई मोहल्लों और चौक में दशकों से एक ही स्थान पर धूणे चेतन हो रहे हैं। ये धूणे इन मोहल्लों और चौक की विशेष पहचान बने हुए हैं। नत्थूसर गेट के पास, फूंभड़ा पाटे के पास, बारहगुवाड़ चौक, हर्षों का चौक, मोहता चौक, हर्षों की ढलान, डागा बिस्सा चौक, बड़ा बाजार, भट्ठड़ो का चौक, नथानी सराय, दम्माणी चौक सहित विभिन्न स्थानों पर हर साल सर्दियों में धूणे चेतन होते हैं।


परकोटा क्षेत्र में लगभग हर चौक व मोहल्ले में धूणे चेतन रहते हैं। सामान्यतया शरद पूर्णिमा के बाद इन धूणों के चेतन होने का क्रम शुरू हो जाता है। सर्दी बढऩे के साथ-साथ गली-मोहल्लों में इनकी संख्या भी बढ़ती जाती है।


सामूहिक सहयोग से संचालन
धूणों पर रोज लकडि़यों व गोबर से बने उपलो की जरुरत रहती हैं। धूणों पर बैठने वाले लोगों के साथ-साथ गली -मोहल्लों में रहने वाले और सेवाभावी लोगों की मदद से लकड़ी-थेपड़ी की व्यवस्था होती है। पूरी सर्दी में आपसी सहयोग से इन धूणों का संचालन होता है। कई स्थानों पर धूणों के शुरू होने से पहले पूजन और प्रसाद का भी वितरण होता है।

धूणा संस्कृति
शहर में लगभग २० से अधिक स्थानों पर
धूणे होते हैं चेतन
देर रात तक अलाव तापने के साथ
होती है समसामयिक विषयों पर चर्चा
देर रात तक चाय की चुस्कियों के साथ
दाल बड़े, गाजर हलवा, दाल का सीरा तथा मूंगफली, तिल से बने लड्डृ, रेवडी, गजक के चलते हैं दौर