
Dhola Maru Love Story (Patrika Photo)
Dhola Maru Love Story: राजस्थान की मरुधरा केवल रणभेरी, जौहर की ज्वाला और वीर शिरोमणि योद्धाओं के बलिदान की कहानियों के लिए ही नहीं जानी जाती। बल्कि यहां की तपती रेत में प्रेम ने भी उतनी ही गहराई से अपनी जड़ें जमाई हैं।
जैसे पंजाब की फिजाओं में 'हीर-रांझा' और सिंध की लहरों में 'सोहनी-महिवाल' की रूह बसती है। वैसे ही राजस्थान के धोरे आज भी एक ऐसी प्रेम कहानी को सुनाते हैं, जो आठवीं शताब्दी से लेकर आज तक उतनी ही जवान है।
इतिहासकारों के शब्दों में कहें तो, "ढोला-मारू की कथा केवल दो हृदयों के मिलन की नहीं, बल्कि यह विश्वास, अंतहीन विरह, महल के भीतर रचे गए षड्यंत्रों और एक अटूट निष्ठा की महागाथा है।"
इस महागाथा की शुरुआत नरवर (वर्तमान मध्यप्रदेश का क्षेत्र) के राजा नल के पुत्र शाल्वकुमार (ढोला) और पूंगल (बीकानेर क्षेत्र) के राजा पिंगल की पुत्री मारुवणी (मारू) से होती है। उस दौर में अकाल की विभीषिका के बीच मानवीय समझौते के तहत इनका विवाह कर दिया गया था। उस समय ढोला की आयु मात्र तीन वर्ष थी और मारू केवल डेढ़ वर्ष की थी।
विवाह के पश्चात ढोला नरवर लौट आया। समय बीतता गया, साल दशकों में बदल गए और ढोला युवावस्था की दहलीज पर पहुंचकर इस बचपन के बंधन को पूरी तरह विस्मृत कर बैठा। उधर, पूंगल की राजकुमारी मारू, जो अब सौंदर्य की प्रतिमूर्ति बन चुकी थी, अपने पति की प्रतीक्षा में विरह की अग्नि में जल रही थी।
ढोला का दूसरा विवाह नरवर की राजकुमारी मालवणी से हो गया, जो अत्यधिक ईर्ष्यालु स्वभाव की थी। उसे जब ढोला के बचपन के विवाह का पता चला, तो उसने पूंगल से आने वाले हर संदेशवाहक को नरवर की सीमा पर ही मरवाने का षड्यंत्र रच दिया, ताकि ढोला को कभी मारू की याद न आए।
जब कोई भी संदेश ढोला तक नहीं पहुंचा, तो राजा पिंगल ने एक अनोखी योजना बनाई। उन्होंने एक चतुर ढोली (लोकगायक) और एक नर्तकी को नरवर भेजा। यह यात्रा साधारण नहीं थी, बल्कि सात महीने के कठिन रास्तों को पार कर वे नरवर पहुंचे।
एक काली, मेघाच्छन्न रात में जब बिजली चमक रही थी और वर्षा की फुहारें गिर रही थीं, ढोली ने ढोला के महल के नीचे 'मल्हार राग' में विरह के दोहे गाना शुरू किया। उस मधुर और दर्दभरे संगीत ने ढोला के सोए हुए अतीत को झकझोर दिया। जैसे ही ढोली ने ऊंची टेर में गाया "ढोला नरवर सेरियां, धण पूंगल गलियांह" (हे ढोला, तुम नरवर की गलियों में हो और तुम्हारी अर्धांगिनी पूंगल की गलियों में विरह में है)
ढोला को बचपन का वो धुंधला सा चेहरा और अपना वचन याद आ गया। स्मृतियां लौटते ही ढोला ने बिना पल गंवाए अपना तेज गति वाला काला ऊंट निकाला और रेगिस्तान के तूफानों को चीरते हुए अपनी पहली पत्नी को लाने के लिए निकल पड़ा।
आज जिसे हम राजस्थान का 'स्टेट एंथम' या स्वागत गीत कहते हैं "केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस", उसकी जड़ें इसी ढोला-मारू की विरह गाथा में हैं। रानी लक्ष्मीकुमारी चुण्डावत की प्रसिद्ध पुस्तक 'राजस्थान की प्रेम कथाएं' में इसका विस्तृत ब्यौरा मिलता है। मारू ने अपने विरह और पुकार को जिन शब्दों में पिरोया, वही सुर आगे चलकर राजस्थान की पहचान बन गए।
इस गीत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमर करने का श्रेय बीकानेर की सुप्रसिद्ध मांड गायिका पद्मश्री अल्लाह जिल्लाही बाई को जाता है। उन्होंने महाराजा गंगा सिंह के दरबार में इस गीत को वो शास्त्रीय ऊंचाई दी कि आज दुनिया भर में राजस्थान का नाम लेते ही 'केसरिया बालम' की धुन कानों में गूंजने लगती है।
ढोला और मारू का मिलन इतना सरल नहीं था। वापसी के मार्ग में सिंध का राजा उमर सूमरा, जो मारू की सुंदरता पर मोहित था, उसने उन्हें रोकने के लिए कई जाल बिछाए। लेकिन ढोला का साहस और उसके वफादार ऊंट की गति के आगे कोई भी बाधा नहीं टिक सकी। यह ऊंट राजस्थानी लोककथाओं में केवल एक पशु नहीं, बल्कि धैर्य और निष्ठा का प्रतीक माना गया है।
अंत में ढोला अपनी मारू को लेकर नरवर पहुंचा। लोककथाओं के अनुसार, ढोला की दूसरी पत्नी मालवणी ने भी अंततः इस सत्य को स्वीकार किया और वे सभी प्रेमपूर्वक रहने लगे।
राजस्थान के गांवों में आज भी "ढोला" शब्द केवल एक नाम नहीं, बल्कि पति और प्रेमी का पर्यायवाची बन चुका है। नवविवाहित जोड़ों को आज भी "ढोला-मारू की जोड़ी" कहकर आशीर्वाद दिया जाता है। 'केसरिया बालम' मांड शैली का गीत है, जिसमें नवरसों का समावेश होता है। इसमें विरह प्रमुख है, लेकिन यह शृंगार और वीरता की भी गूंज देता है।
उदयपुर की बागोर की हवेली में पिछले 25 वर्षों से 'धरोहर' कार्यक्रम का आयोजन हो रहा है, जिसकी शुरुआत ही 'केसरिया बालम' से होती है, जो पर्यटकों को ढोला-मारू के युग में ले जाता है। राजस्थान की लघु चित्रकारी कठपुतली कला और लोक नाटकों में इस जोड़ी को आज भी प्रमुखता से चित्रित किया जाता है।
ढोला-मारू की यह गाथा केवल एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह उस काल का चित्रण है जब अकाल, पलायन और युद्धों के बीच भी मानवीय संवेदनाएं जीवित थीं। यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे समय के कितने ही पहाड़ बीच में आ जाएं या षड्यंत्रों की दीवारें खड़ी हो जाएं, 'निष्ठा' और 'प्रेम' अपना मार्ग खोज ही लेते हैं।
सदियों बीत जाने के बाद भी, जब रेगिस्तान की सर्द रातों में ढोल की थाप पर ढोला-मारू के दोहे गाए जाते हैं, तो ऐसा महसूस होता है जैसे हवा के झोंके आज भी पूंगल से नरवर की ओर मारू का संदेश लेकर जा रहे हों।
Updated on:
07 Feb 2026 02:44 pm
Published on:
07 Feb 2026 02:44 pm
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