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करणी माता ने यहां बिताया था अंतिम समय, दिव्य ज्योत में हो गईं विलीन

नवरात्र पर भरता है मेला : करणी माता का निर्वाण स्थल है गडिय़ाला, नवरात्र में पहुंचते हैं हजारों श्रद्धालु

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करणी माता ने यहां बिताया था अंतिम समय, दिव्य ज्योत में हो गईं विलीन

करणी माता ने यहां बिताया था अंतिम समय, दिव्य ज्योत में हो गईं विलीन

श्रीकोलायत. बीकानेर जिला मुख्यालय से करीब 90 किलोमीटर दूर दियातरा गांव से आगे संपर्क सड़क पर करणी माता की निर्वाण स्थली है। यहां करणी माता ने अपना अंतिम समय बिताया था और निर्वाण किया था।


किवंदती के अनुसार बीकानेर नगर की स्थापना आराध्य करणी माता के आशीर्वाद से हुई थी। यह उन दिनों की बात है जब जैसलमेर और बीकानेर रियासत के बीच सीमा विवाद था जो लंबे समय से इलाके के लोगों के लिए नासूर था। इस बात की जानकारी जब करणी माता को मिली तो वे बड़ी ङ्क्षचतित हुई। इसको लेकर करणी माता जैसलमेर यात्रा को निकली और तत्कालीन महारावल से मुलाकात की।

उन्होंने इस विवाद को खत्म करने की शपथ दिलवाई। महारावल ने करणी माता की बात रखी एवं विवाद खत्म करने का वायदा किया।इसके बाद करणी माता बीकानेर राज दरबार में पहुंची और विवाद खत्म करने की बात यहां भी दोहराई। राजा ने सहमति प्रदान की। यह विवाद एकबारगी खत्म हो गया लेकिन यह समाधान स्थाई तौर पर लागू नहीं हो पाया। विवाद फिर बढ़ा मार काट हुई। यह वह समय था जब करणी माता जीवन के अंतिम पड़ाव में थी एवं गडिय़ाला ग्राम के आसपास निवास करती थी। पानी के साधन के लिहाज से पास में धनेरी तलाई थी।

जीवन के अंत काल में उन्होंने दोबारा जैसलमेर व बीकानेर के राजाओं को बुलाया और एकता का मंत्र दिया। सीमा विवाद के बारे में कहा कि आज जहां मैं बैठी हूं, उसके इस तरफ बीकानेर होगा और उस तरफ जैसलमेर होगा। मेरी बात नहीं मानी तो दोनों राज्यों पर ईश्वरीय कृपा खत्म हो जाएगी। यह बात सख्त लहजे में समझाई, दोनों राजा समझ गए, उस दिन के बाद दोनों रियासतों का विवाद खत्म हो गया।


काफी दिन बीते एक दिन करणी माता अपने पांच पत्थरों पर बैठी थी जहां वह अक्सर बैठती थी। पुत्र को धनेरी तलाई से जल लाने को बोली। पुत्र को थोड़ी देर हुई, तब सेवक शारंग बिश्नोई को झरी से पानी निकालकर सिर पर उड़ेलने को कहा तो सेवक ने ऐसा ही किया। पानी सिर पर डालते ही करणी माता दिव्य ज्योत में विलीन हो गई। पांच पत्थरों में से एक पत्थर नींव में लगाया गया। एक पत्थर मूर्ति के नीचे लगाया गया और तीन पत्थर आज भी निज मन्दिर में विद्यमान है।


मंदिर का समय-समय पर हुआ जीर्णोद्धार: गडिय़ाला मन्दिर का सबसे पहले निर्माण स्थानीय लोगों के माध्यम से करवाया गया। इसके बाद इसको शायर बाईसा ने पूजा कर संवारा। इनके बाद समय-समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। गडिय़ाला रिण मढ़ मन्दिर में नवरात्र में घट स्थापना गांव का रावला प्रमुख ठाकुर परिवार करता है। यहां अष्टमी व नवमी पर महाप्रसाद रखा जाता है जिसमें आसपास के गांवों के हजारों लोग कड़ाव से प्रसाद ग्रहण करते हैं।