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हल्दीघाटी युद्ध की तलवार बीकानेर में, साल में दो बार होती है पूजा

इतिहासकार तंवर का दावा : महाराणा प्रताप के सैनिक के पास थी यह तलवार; 443 साल पहले लड़ा गया था युद्ध हल्दीघाटी युद्ध विशेष

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Haldighati sword of war, in Bikaner, is worshiped twice in a year

हल्दीघाटी युद्ध की तलवार बीकानेर में, साल में दो बार होती है पूजा

जयभगवान उपाध्याय

बीकानेर. महाराणा प्रताप के शौर्य को प्रदर्शित करने वाले हल्दीघाटी युद्ध के बारे में सभी ने खूब पढ़ा होगा, लेकिन इस युद्ध में काम में ली गई एक तलवार के बीकानेर शहर में मौजूद होने के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। यह तलवार बीकानेर के इतिहासकार ठाकुर महावीर सिंह तंवर ने संजोकर रखने का दावा किया है। यह तलवार महाराणा प्रताप के एक सैनिक के पास थी, जो रामशाह तंवर के पास पहुंचने का दावा किया जा रहा है। इस तलवार की यहां साल में दो बार पूजा भी होती है।

ठाकुर महावीर सिंह ने बताया कि उनके पास मौजूद तलवार को देखने बीकानेर के ही नहीं, बल्कि देश-विदेश के शोधार्थी और पर्यटक भी आते हैं। उन्होंने कहा कि 443 साल पूर्व 18 जून, 1576 को हुए हल्दीघाटी युद्ध में करीब पचास हजार योद्धा और हाथी-घोड़े मारे गए थे। युद्ध इतना भीषण था कि तलवार पर अब गहरे निशान पड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि इस युद्ध में उनके वंशजों की तीन पीढि़यां एक साथ शहीद हुई थी।

ग्वालियर के तत्कालीन राजा रामशाह तंवर ने भी इस युद्ध में हिस्सा लिया था। रामशाह तंवर के वंशज ठाकुर महावीर सिंह ने बताया कि हर साल रामनवमी और दशहरे पर तलवार की विशेष पूजा होती है। इसमें शामिल होने वाले लोग दो मिनट का मौन रखकर युद्ध में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देते हैं।

68 हजार सैनिकों ने लिया हिस्सा

हल्दीघाटी का युद्ध मेवाड़ के राणा महाराणा प्रताप और मानसिंह के नेतृत्व वाली अकबर की सेना के बीच हुआ था। इस युद्ध में दोनों सेनाओं के करीब 68 हजार सैनिकों ने हिस्सा लिया। इसमें मानसिंह की सेना के 60 हजार तथा महाराणा प्रताप की सेना के महज 8 हजार सैनिक थे। महावीर सिंह तंवर ने बताया कि युद्ध से पूर्व अकबर ने मानसिंह को महाराणा प्रताप को लाने कहा था, लेकिन मानसिंह यह कार्य करने में विफल रहे। तंवर ने बताया कि इतिहास के पन्नों को देखें तो पता लगता है कि तीन बार मुगलों को पीछे हटना पड़ा था।