
kurja
निखिल स्वामी. बीकानेर. रूस से 105 दिन पहले रवाना टैग लगी दो कुरजां बुधवार को बीकानेर जिले की लूणकरनसर झील पर नजर आई। ये कुरजां 14 हजार 719 किलोमीटर का सफर पूरा कर किस रास्ते से यहां पहुंची इसका पता चला है। पक्षी विशेषज्ञों के लिए यह अध्ययन और हवाई मार्ग का विश्लेषण करने के काम आएगा। वहीं साथ ही प्रवासी पक्षियों के बारे में कुछ नई जानकारियां भी सामने आने की उम्मीद है।
लूणकरनसर की झील पर नजर आई कुरजां के पैर पर सफेद रंग का रिंगगिंग कॉलर लगी मिली है। इस कुरजां की पहचान पक्षी विशेषज्ञों ने टैग के यू-वन नंबर से कर ली है। इसका आइडी नंबर केएन ६५०४ है। जिसे रूस के पक्षी वैज्ञानिकों ने लगाकर छोड़ा था। इस टैग की मदद से कुरजां के रूस से बीकानेर तक के सफर का पूरा ग्लोबल मेप भी तैयार हो गया है।
रूस के शोध संस्थान को भेजे फोटो
पक्षी विशेषज्ञ डॉ. दाउलाल बोहरा ने बताया कि लूणकरणसर में यू-वन टैग लगी मिली दोनों कुरजां की जानकारी फोटो के साथ रूस के शोध संस्थानों व वैज्ञानिकों को भेजी गई है। उनसे सम्पर्क करने पर पता चला कि ये कुरजां रूस के ओजिरो बेली से 14 जुलाई 2019 को रवाना हुई थी।
एक हजार कुरजां की टैगिंग
डॉ. बोहरा ने बताया कि रूस के वैज्ञानिकों की ओर से कुरजां पर शोध के लिए एक हजार क्रेन प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। जिसमें एक हजार पक्षियों पर ट्रांसमीटर लगाकर सैटेलाइट टैगिंग की गई है। इन पक्षियों में से कई पक्षियों की लोकेशन जोधपुर, खींचन, नाल, लूणकरणसर व कच्छ भूज आदि क्षेत्रों में आई है।
इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य कुरजां के प्रवासन मार्ग, प्रवासन स्थलों की दूरी, अधिकतम ऊंचाई पर उड़ान, अनुकूल तापमान आदि की जानकारी प्राप्त करना है।
हर साल बदलती रास्ता
विशेषज्ञों की माने तो कुरजां हर साल मौसम परिवर्तन के साथ अपना रास्ता बदल लेती है। रूस में बर्फबारी शुरू होते ही कुरजां गर्म क्षेत्रों की ओर रवाना हो जाती है। वे रूस से कई देशों से होकर हजारों किलोमीटर का सफर पूरा कर भोजन व पानी की तलाश में हर साल राजस्थान आती है।
सेटेलाइट से टैग की ट्रेकिंग
में सामने आया कि इस बार कुरजां रशिया, कजाकिस्तान, किर्गीस्तान, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब होते हुए राजस्थान में आई है।
Published on:
31 Oct 2019 11:49 am

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