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विदेशी रेसिंग साइकिल का देशी इंजीनियर ‘महफूज’

- देशभर से विदेशी रेसिंग साइकिल आती है मरम्मत के लिए बीकानेर -पत्रिका विशेष-

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विदेशी रेसिंग साइकिल का देशी इंजीनियर 'महफूज'

विदेशी रेसिंग साइकिल का देशी इंजीनियर 'महफूज'

-दिनेश स्वामी

बीकानेर. लाखों रुपए कीमत की विदेशी रेसिंग साइकिल का देशी इंजीनियर के रूप में देशभर में पहचान करने वाले बीकानेर के महफूज अली अच्छे-अच्छे इंजीनियरों को मात देते है। देश-दुनिया में चलन में रही रेसिंग साइकिल भले कोई भी हो उसमें खराबी होने पर मजफूज अपने औजारों की मदद से तुरंत दुरुस्त कर देते हंै। उनके पास गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा समेत हर राज्य से साइकिल मरम्मत के लिए आती है। इन साइकिलों के कल-पुर्जों की व्यवस्था करना सबसे कठिन काम होता है। जो खराब पुर्जे बदलने होते है उन्हें विदेश से मंगवा लेते हैं। जो नहीं मिलते उन पुर्जों को महफूज खुद तैयार कर देते है।

बीकानेर शहर में कसाइयों की बारी में सात-आठ फीट की दुकान पर औजारों से विदेशी साइकिल का रिम ठीक करने में जुटे महफूज को देखकर विश्वास ही नहीं होता कि इसके हाथ के हुनर के कद्रदान देश-दुनिया में हजारों साइक्लिस्ट है। वे चालीस साल से साइकिल मरम्मत का काम कर रहे है। बीकानेर के साइक्लिस्टों की पांच दशक पहले से रेसिंग में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान है। यही वजह है कि साधारण भारतीय साइकिलों की मरम्मत का काम करते-करते महफूज रेसिंग साइकिलों का कुशल इंजीनियर बन गए।

अब एल्युमिनियम और फाइबर

महफूज बताते है कि आज भी रेसिंग साइकिल विदेश में ही बनकर भारत आती है। पहले लोहे की साइकिल रेसिंग में काम ली जाती थी। फिर एल्युमिनियम की साइकिल चलन में आई। अभी सात-आठ साल से कार्बन फाइबर की साइकिल आ रही है। उसके पास इंग्लैण्ड, यूएस, इटली, जर्मनी, चीन, यूएसए, जापान और ताइवान आदि देशों में निर्मित रेसिंग साइकिल मरम्मत के लिए आती है।

हर राज्य के साइक्लिस्टों से पहचान

महफूज के पास पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, यूपी, एमपी, गुजरात और महाराष्ट्र के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय साइक्लिस्टि अपनी साइकिल मरम्मत के लिए भेजते है। उन्हें राजस्थान साइकिल एसोसिएशन अपने आयोजनों में बतौर मैकेनिग और मैनेजर के रूप में बुलाती है। ऑल इंडिया साइकिल रेसिंग, साइकिल फेडरेशन ऑफ इंडिया के आयोजनों में शामिल हुए हैं।

छोटा सा पुर्जा बड़ा कारनामा

साइकिल रेस में साइक्लिस्टि अपनी ताकत से साइकिल को दौड़ाता है। परन्तु इसमें उसकी साइकिल के छोटे से पुर्जे का रफ्तार में बड़ा रोल रहता है। पुर्जे की फिटिंग उसकी रेस को कई गुणा बढ़ाने में मदद करती है। महफूज बताते हैं कि वर्ष १९८६-८७ में राजस्थान के साइक्लिस्टों की साइकिल को रेस में मजबूती दिलाने के लिए काटरलैस के पांच सेट तैयार किए। जिसकी बदौलत रेसर साइकिल रेस में कई मेडल जीतने में कामयाब रहे। इसके बाद उनके हुनर को रेसर जानने लग गए।

बीकानेर का साइकिल रेस में बड़ा नाम

बीकानेर से निकले कई साइक्लिस्टों ने देश-दुनिया में नाम कमाया। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय साइक्लिस्टि में गणेशलाल सुथार, नरेन्द्र कुमार ओझा, इंडियन रेलवे के साइकिल रेस कोच राजेन्द्र बिश्नोई, खेल कोटे से एसआइ लगे जोधपुर कार्यरत मनोहरलाल बिश्नोई, दयालाराम सहारण उर्फ काका इंडियन साइकिल टीम को कोचिंग दे रहे है।

पुर्जे तक बना देते है वह

महफूज बताते है कि एक लाख रुपए से दस लाख रुपए तक की रेसिंग साइकिल आती है। प्रदेश के साइकिल रेसर तीन लाख रुपए तक की साइकिल का उपयोग अधिक करते है। साइकिल की रफ्तार उसके व्हील पर ज्यादा निर्भर करती है। यही वजह है कि अब कार्बन फाइबर के व्हील आने लगे हैं। विदेशी साइकिलों के खराब पुर्जे बदलने के लिए ऑनलाइन विदेश से मंगवाते है। जो नहीं मिलते उन पुर्जों को वह स्वयं अपनी वर्कशॉप में तैयार करते है।