
राम-राम सा...से मन स्पर्श, मां की लोरी और माटी की सुगंध से दिलों में उतरीं मुर्मू
दिनेश कुमार स्वामी
बीकानेर. डॉ. करणीसिंह स्टेडियम में राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव के मंच पर सोमवार को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने आपको मेरी राम-राम सा... के साथ संबोधन शुरू किया, तो हर कोई उनकी आत्मीयता का कायल हो गया। गांवों में कला की सुगंध और कलाकारों की तपस्या से सीख लेने जैसी बात राष्ट्रपति के मुख से सुन वहां मौजूद देशभर से आए सैकड़ों कलाकार गौरवान्वित हो उठे।राष्ट्रपति के करीब दस मिनट के संबोधन में उनकी सादगी के साथ देश की मिट्टी की खुशबू को हर किसी ने महसूस किया।
राष्ट्रपति मुर्मू ने मां की लोरी, कोयल के गीत, मोर का नृत्य और बाल लीलाओं को हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत बताया, तो लोगों का रोम-रोम प्रकृति की अनोखे उपहारों को महसूस कर खिल उठा। उन्होंने देशभर से आए सैकड़ों कलाकारों के साथ सामूहिक फोटो कराने के साथ उनसे बात भी की। साथ ही नन्हें कलाकारों को दुलार भी दिया।
केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने कहा कि राष्ट्रपति के आगमन से राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव में चार चांद लग गए हैं। उन्होंने सोने री धरती जठ, चांदी रो आसमान, रंग-रंगीलो रसभरो म्यारो प्यारो राजस्थान का दोहा बोला, राष्ट्रपति ने ताली बजाकर प्रदेश की गरिमा बढ़ाई। इससे पहले राज्यपाल कलराज मिश्र ने देश की कला और संस्कृति पर अपने विचार रखे।बीकानेर की पहचान महल-किले और त्योहार
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि बीकानेर को यहां के खाद्य पदार्थों से जानते होंगे, लेकिन इतिहास में यहां के महल और किले महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। बीकानेर के ऊंटों के नृत्य और त्योहारों के लिए भी पहचान है। शिक्षा मंत्री डॉ. बीडी कल्ला और महापौर सुशीला कंवर भी मंचासीन रहे। केन्द्रीय मंत्री मेघवाल ने राष्ट्रपति को बीकानेर की उस्ताकला से बना स्मृति चिन्ह, शॉल भेंटकर अभिनंदन किया।
साथ ही भगवान श्रीनाथ का चित्र भी भेंट किया। नोखा विधायक बिहारीलाल बिश्नोई, लूणकरनसर विधायक सुमित गोदारा, बीएसएफ डीआइजी पुष्पेन्द्र सिंह, जिला प्रमुख मोड़ाराम, संभागीय आयुक्त नीरज के. पवन, आइजी ओमप्रकाश, जिला कलक्टर भगवती प्रसाद कलाल, पुलिस अधीक्षक तेजस्वनी गौतम भी मौजूद रहीं।धूप से हुई परेशानी
कार्यक्रम स्थल पर लोग दोपहर दो बजे पहुंचने शुरू हो गए। तेज धूप से काफी देर तक लोग कुर्सियों पर नहीं बैठे और संस्कृति महोत्सव परिसर में बने डाेम में घूमते रहे। सबसे पहले कुछ स्कूली बच्चों ने दर्शक दीर्घा में कुर्सियों पर बैठना शुरू किया। वह भी धूप में परेशान दिखे। बाद में धूप कम होने पर बड़ी संख्या में लोग आयोजन में शामिल हुए।भाजपा नेताओं ने किया अभिनंदन
राष्ट्रपति मुर्मू दोपहर साढ़े तीन बजे विशेष विमान से नाल एयरफोर्स स्टेशन पहुंचीं। यहां से सड़क मार्ग से डॉ. करणी सिंह स्टेडियम पहुंचकर महोत्सव में शामिल हुईं। उन्होंने रिक्शा में बैठकर देश के सात सांस्कृतिक जोन की ओर से बनाए गए आंगनों का अवलोकन किया। भाजपा जिलाध्यक्ष विजय आचार्य, देहात जिलाध्यक्ष जालमसिंह भाटी, मोहन सुराणा, अशोक प्रजापत, सत्यप्रकाश आचार्य, अखिलेश प्रताप सिंह आदि ने राष्ट्रपति का अभिनंदन किया।
परम्पराओं में नई सोच को स्थान दें
राष्ट्रपति ने कहा कि प्रौद्योगिकी का परम्पराओं से और विज्ञान का कला से मेल होना जरूरी है। हर क्षेत्र में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सहायता से नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं। कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी टेक्नोलॉजी को अपनाया है। नई टेक्नोलॉजी से देश की कला, परम्पराओं और संस्कृति का व्यापक प्रसार कर सकते हैं। हमें अपनी परम्पराओं में नए विचारों और नई सोच को स्थान देना चाहिए। इससे नई पीढ़ी जुड़ेगी। बच्चे देश की अनमोल विरासत के महत्व को समझें, यह बहुत जरूरी है।
कलाकार के जीवन तपस्या सीखें
राष्ट्रपति ने कहा कि सच्चे कलाकारों का जीवन तपस्या का उदाहरण होता है। किसी भी काम को एकाग्रता और समर्पण के साथ करना कलाकारों से सीख सकते हैं। राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव बीकानेर में देशभर से एक हज़ार से भी अधिक कलाकार और कारीगर अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे। ऐसे महोत्सव राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करते हैं।
भारत सृष्टि की प्रत्येक रचना का उदाहरण
राष्ट्रपति ने कहा कि प्राचीन काल से ही हमारी कला शैली उच्च स्तर की रही है। सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से ही नृत्य, संगीत, चित्रकारी, वास्तुकला जैसी कलाएं विकसित थीं। भारतीय संस्कृति में अध्यात्म की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। सृष्टि की प्रत्येक रचना कला का अद्भुत उदाहरण है। नदी की लहर का मधुर संगीत हो या मयूर का मनमोहक नृत्य, कोयल का गीत हो। मां की लोरी या नन्हें से बच्चे की बाल-लीला हो, हमारे चारों तरफ कला की सुगंध फैली हुई है।
परिवर्तन में बुनियादी मूल्य नहीं छोड़ें
उन्होंने कहा कि परिवर्तन जीवन का नियम है। कला शैली, रहन-सहन का ढंग, वेश-भूषा, खान-पान सब में समय के साथ बदलाव आना स्वाभाविक है। परन्तु कुछ बुनियादी मूल्य और सिद्धांत पीढ़ी दर पीढ़ी आगे चलते रहने चाहिए। तभी भारतीयता को हम जीवित रख सकते हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना, शांति और अहिंसा, प्रकृति से प्रेम, सब जीवों के लिए दया, दृढ़ संकल्प से आगे बढ़ना आदि मूल्य देशवासियों को एक सूत्र में बांधते हैं। आज भारत विश्व में अपनी नई पहचान बना चुका है। इसमें आधुनिक सोच को अपनाने के साथ-साथ परंपराओं और संस्कृति को सहेजने की क्षमता है।
गांवों में कला भरी पड़ी
हम गांव के रहने वाले हैं। गांवों में ऐसे संगठित कलाकार नहीं हैं, लेकिन कला गांवों में भरपूर है। इन कलाकारों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। उनमें जो महक, सुगंध और ऊर्जा है, लोगों को दिखनी चाहिए। आजकल पढ़े लिखे बच्चे, जो 21वीं सदी में जी रहे हैं। गांव की सुगंध से दूर होते जा रहे हैं। आजकल हम पश्चिम दिशा में नजर डालते हैं, परन्तु कला हमारे अंदर कूट-कूट कर भरी है, उसे भी देखना चाहिए।
Published on:
28 Feb 2023 12:48 pm
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