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ओटीटी के रास्ते अश्लीलता का बैकडोर प्रवेश

ओटीटी के प्रति लगातार बढ़ते रुझान से पडऩे वाले असर को लेकर इंजीनियरिंग कॉलेज बीकानेर के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गौरव बिस्सा व असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नवीन शर्मा ने 500 से अधिक लोगों पर शोध कर अपनी रिपोर्ट तैयार की है, जिसे वे सेंसर बोर्ड, केंद्र सरकार और इंटरनेशनल जर्नल को भी भेजने वाले हैं। शोध के आंकड़ें चौकाते हैं। इसलिए कि इसमें जो तथ्य निकल कर आए हैं, वे सॉफ्ट पोर्न इंडस्ट्री के भी चुपके से मनोरंजन क्षेत्र में प्रवेश का रास्ता बनाते दिख रहे हैं।

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ओटीटी के रास्ते अश्लीलता का बैकडोर प्रवेश

ओटीटी के रास्ते अश्लीलता का बैकडोर प्रवेश

बीकानेर. मनोरंजन जगत में पिछले दो साल का समय 360 डिग्री परिवर्तन का दौर कहा जा सकता है। कोरोना काल में जब दुनिया घरों के अंदर सिमटी बैठी थी, तो मनोरंजन की जिस विधा ने घरों के जरिये इस दुनिया में धमाकेदार एंट्री मारी, उसे हम आज ओटीटी प्लेटफार्म के तौर पर जानते हैं। अब आलम यह है कि ओटीटी के कंटेंट, प्रस्तुतिकरण, बेलौस अंदाज और कसे हुए निर्देशन ने बॉलीवुड जैसी इंडस्ट्री को भी झकझोर दिया है। प्रचलित तथ्य है कि हर नए आविष्कार के साथ कुछ दुश्वारियां और साथ में बुराइयां भी आती हैं। ओटीटी प्लेटफार्म के साथ भी ऐसा ही है, जहां कुछ अच्छी और मनोरंजक फिल्मों और सीरीज के साथ ही अपशब्दों, गालियों, हिंसा की भरमार जैसे कंटेंट ने समाज के लिए भी चिंताजनक स्थिति पैदा कर दी है।

ओटीटी कंटेंट को सेंसर करने की आवश्यकता
नवम्बर 2021 में सरकार ने ओटीटी कंटेंट रेगुलेशन के लिए गजट नोटिफिकेशन जारी कर देश में डिजिटल कंटेंट की निगरानी हेतु कानून या संस्था बनाना आवश्यक बताया। ओटीटी प्लेटफॉम्र्स पर मनोरंजक, साहित्यिक और सूचनापरक सामग्री उपलब्ध है लेकिन उनकी विजिबिलिटी अपेक्षाकृत कम है। सर्वे में शामिल 88 फीसदी लोग मानते हैं कि जनमानस ने ओटीटी को हिंसा, महिला अत्याचार और अश्लीलता से ही जोड़ दिया है जबकि यह अर्धसत्य है। ओटीटी पर प्रसारित कई ज्ञानवर्धक वेबसीरीज ने दर्शकों का मन मोहा है। अत: आवश्यकता ओटीटी के कंटेंट को सेंसर किये जाने की है। 88 फीसदी प्रतिभागियों के अनुसार ओटीटी के कंटेंट को रेगुलेट करना अत्यंत आवश्यक है।

क्या तथ्य निकल कर आए
2२.४ फीसदी व्यक्ति एडल्ट या इरोटिक फिल्में, 1४.४ फीसदी व्यक्ति म्यूजिक वीडियो और लगभग 6३.२ फीसदी व्यक्ति ऑनलाइन वेब सीरीज देखना पसंद करते हैं।
अधिकांश दर्शक ओटीटी को एडल्ट फिल्म और ङ्क्षहसा से संबधित कंटेंट का ही प्लेटफार्म मानते हैं।
भारत में औसतन एक वयस्क एक दिन में साढ़े तीन घंटे मोबाइल स्क्रीन या इंटरनेट पर बिता रहा है। इस कारण वह इसका सदुपयोग करने के स्थान पर दुरूपयोग करते हुए अश्लील सामग्री का भण्डारण कर रहा है। क्योंकि इंटरनेट से डाउनलोड होने वाला 40 फीसदी कंटेंट अश्लील है। लगभग 84 फीसदी लोगों का मानना है कि इसके कारण महिला सम्मान में भी कमी आई है।
89 फीसदी लोग ओटीटी कंटेट में ङ्क्षहसा, घृणा, लुगदी साहित्य, एडल्ट कंटेंट की वेब सीरीज, गाली गलौच और अपशब्दों की भरमार को अपराधों के बढऩे का एक कारक भी मानते हैं।
युवाओं में सेल्फ स्टडी की प्रवृत्ति में गिरावट दिखी, क्योंकि अब मनोरंजन-रक्त रंजित ङ्क्षहसा और इरोटिक कंटेंट में तलाशा जा रहा है। बाल साहित्य के प्रकाशन में कमी आना, युवाओं द्वारा अखबार न पढ़े जाने के पीछे भी वाहियात ओटीटी कंटेंट अपनी भूमिका निभा रहा है। ऐसा 87 फीसदी लोगों का मत है।


ऐसे किया शोध

347 पुरुषों व 184 महिलाओं को लेकर किये शोध में प्रतिभागियों से गत तीन महीनों के दौरान ब्लेंडेड मोड में प्रश्नवलियां भरवाई गईं, जिसमे 49 ऑफलाइन और 482 ऑनलाइन मोड में भरवाई गई। इसके बाद प्राप्त आंकड़ों के सांख्यिकी टेस्ट किए गए। फीडबैक देने वाले प्रतिभागियों में राजस्थान, तमिलनाडु, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, केरल इत्यादि राज्यों के प्रतिभागी
शामिल हुए।

केंद्र सरकार और अंतरराष्ट्रीय जर्नल को भेजेंगे
अश्लीलता और हिंसा परोसते ओटीटी प्लेटफॉम्र्स पर सरकारी नकेल आवश्यक है। युवाओं का समय कीमती है, इसलिये ज्ञानवर्धक व नैतिकता सिखाते कंटेंट ओटीटी प्लेटफॉम्र्स को दिखाने चाहिए। यह शोध हम भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अलावा सेंसर बोर्ड और अंतरराष्ट्रीय जर्नल को भी भेज रहे हैं।
-डॉ. नवीन शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, इंजीनियरिंग कॉलेज बीकानेर

पर्यवेक्षण जरूरी है
शुद्ध अच्छे कंटेंट््स में मनोरंजन ढूंढने के स्थान पर ओटीटी प्लेटफॉम्र्स पर हिंसा, षड्यंत्र और सामाजिक बुराइयों में मनोरंजन खोजा जाना क्रिमिनल मेंटेलिटी को बढ़ाता है। इसका पर्यवेक्षण जरूरी है।
- डॉ. गौरव बिस्सा, एसोसिएट प्रोफेसर