
छह साल की आयु में पकड़ी संगीत की अंगुली, मांड ने दिलाई ताउम्र की शोहरत
जिले के तेजरासर गांव से निकले दो भाइयों अली-गनी ने गायकी और अपने संगीत से दुनिया को अपना मुरीद बना लिया। छह साल की आयु में पिता सिराजुद्दीन से संगीत के सुर-ताल सीखे और फिर उस्ताद मुनव्वर अली से कोलकाता में शास्त्रीय संगीत के साथ ठुमरी, दादरा सीखी। आकाशवाणी में गाने की शुरुआत करने के बाद कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। राजस्थान की धरोहर मांड गायन में अपनी सुरीली आवाज से ख्याति दिलाने का श्रेय भी अली-गनी की जोड़ी को जाता है। भारत सरकार की ओर से इस जोड़ी को पदमश्री से नवाजने की घोषणा की गई है।
पिता बने पहले गुरु
अली-गनी ने राजस्थान पत्रिका से बातचीत में बताया कि उस्तादों से मिली शिक्षा और जनता से गायकी और संगीत को मिले प्यार की बदौलत आज उन्हें यह सम्मान मिला है। उन्होंने अपनी संगीत और गायन की यात्रा के बारे में बताया कि 6 साल की आयु में पिता पहले गुरु बने। पटियाला संगीत घराने से ताल्लुकात रखते हैं। दोनों भाइयों की आयु अब 61 ओर 64 साल की हुई है। इस आयु तक जीवन यात्रा में संगीत की तपस्या से सम्मान मिलना उनके लिए बड़ी बात है।
गजल के 12 एलबम में दिए और संगीत से छा गए
अली-गनी ने गजल गायक पंकज उधास की 12 गजलों की एलबम के लिए संगीत संयोजन किया। इनमें तेरे हाथ में शराब है, सच बोलता हूं..., चुपके-चुपके सखियों से वो बातें करना भूल गई... को हर महफिल में गाते हैं। वर्ष 1996-97 में मांड गायन में मीरा के भजन का एलबम म्हारा सांवरिया और इस जोड़ी का गाया पधारो म्हारे देश को खूब पसंद किया गया।
Published on:
26 Jan 2024 02:20 pm
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