
बीकानेर. कृष्ण जन्माष्टमी पर एक ओर जहां घर और मंदिरों में भगवान कृष्ण के जन्म की खुशियां मनाई जाती हैं, वहीं शहर के गली-मोहल्लों में रात्रि 12 बजे अधर्म के प्रतीक रूप में कंस का वध होता है। हाथों में लकड़ियां लिए और कृष्ण के जयकारे लगाते बच्चे, युवा और बुजुर्ग कंस का प्रतीकात्मक वध करते हैं। इस दौरान कोई कंस को लकड़ियों से पीटता है, तो कोई उसके सींग, आंख, मूंछ, कान को उखाड़ता है। हर कोई कंस के प्रतीकात्मक वध को आतुर नजर आता है।
मटकी पर मिट्टी से होता है तैयार
जन्माष्टमी के दिन बच्चे और युवा मिट्टी से बनी मटकी पर तालाब की चिकनी मिट्टी से कंस की अनुकृति बनाते हैं। कपड़ों से कंस के हाथ-पांव भी बनाए जाते हैं। मिट्टी से मटकी पर कंस के दो सींग, मुकुट, आंख, नाक, कान, मूंछ, मुंह बनाकर मटकी पर चिपकाए जाते हैं। काजल, कोयला, कुमकुम से सींग, आंख, मूंछ का रंग किया जाता है। मुंह में बरतना अथवा कौड़ी से दांत बनाए जाते हैं।
झलकती है कलात्मकता
कंस बनाने से जुड़े रहे वरिष्ठ नागरिक ईश्वर महाराज छंगाणी बताते हैं कि कंस बनाने वाले व्यक्ति के मन में कंस के अधर्म, अत्याचार, क्रोध, पाप कर्म इत्यादि को लेकर जो घृणा के भाव रहते हैं, उसकी झलक कंस की अनुकृति में झलकती है।
मंदिरों में कंस को देखने आते हैं लोग
जन्माष्टमी पर गली-मोहल्लों में कंस बनाए जाते हैं। कंस को जाल के पेड़ की पत्तियों के नीचे बिठाया जाता है। जन्माष्टमी के दिन मरुनायक मंदिर, मदन मोहन मंदिर, लक्ष्मीनाथ मंदिर में बनने वाले बड़े आकार के कंस प्रसिद्ध हैं। लोग मंदिरों में भगवान के दर्शन के दौरान कंस को भी देखने आते हैं।
Updated on:
27 Aug 2024 12:00 am
Published on:
26 Aug 2024 11:53 pm
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