3 फ़रवरी 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

आजादी के पहले यूएसए की संस्था की जमीन का विवाद 50 साल बाद सुलझा, खरीदार को जमीन लौटाने का आदेश

आजादी के पहले 1941 में यूएसए द्वारा बिलासपुर में खरीदी गई एक जमीन के मामले में सन 1972 से चल रहा केस 50 साल बाद सुलझा है। हाईकोर्ट ने इस पर अंतिम फ़ैसला दिया है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने बिलासपुर एडीजे कोर्ट द्वारा सुनाए गए 1972 के व्यवहार वाद के फैसले को पलट दिया ।

2 min read
Google source verification
आजादी के पहले यूएसए की संस्था की जमीन का विवाद 50 साल बाद सुलझा, खरीदार को जमीन लौटाने का आदेश

आजादी के पहले यूएसए की संस्था की जमीन का विवाद 50 साल बाद सुलझा, खरीदार को जमीन लौटाने का आदेश

बिलासपुर। आजादी के पहले 1941 में यूएसए द्वारा बिलासपुर में खरीदी गई एक जमीन के मामले में सन 1972 से चल रहा केस 50 साल बाद सुलझा है। हाईकोर्ट ने इस पर अंतिम फ़ैसला दिया है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने बिलासपुर एडीजे कोर्ट द्वारा सुनाए गए 1972 के व्यवहार वाद के फैसले को पलट दिया । कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि भारत के बाहर निष्पादित मुख्तियार नामा भी यदि धारा 14 नोटरी अधिनियम 1952, धारा 57 एवम 85 भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 व धारा 33 पंजीकरण अधिनियम के तहत अनुप्रमाणित हो और पुख्ता सबूतों से खंडित न किया गया हो तो साक्ष्य में ग्रहण जा सकता है। इसके साथ ही हाइकोर्ट ने वर्तमान कब्जाधारी को आदेशित किया है कि वह खरीददार को कब्जा वापस दें।

आजादी से पहले सन 1943 में यूसीएमएस (यूनाइटेड क्रिश्चियन मिशनरी सोसाइटी ) यूएसए ने कुछ प्रापर्टी बिलासपुर में खरीदी थी। उसके बाद यह संस्था 1962 में वापस चली गई। जाने से पहले उसने एक लोकल बॉडी, इंडियन चर्च काउंसिल ऑफ डिसाइपल्स ऑफ क्राइस्ट को एक लाइसेंसी के तौर पर भूमि का उपयोग करने की अनुमति दी। लगभग 40 हजार इस्क्वेयर फिट की प्रापर्टी के लिए 17 सितंबर 1971 में यूसीएमएस यूएसए से नोटराइज्ड पावर ऑफ अटॉर्नी इंडियन एम्बेसी से भेजी गई। एक मुख्तियार के माध्यम से उस समय के बिलासपुर के नगर सेठ बनवारी लाल अग्रवाल को उक्त जमीन बेच दी गई। उसके बाद आईसीसीडीसी चर्च द्वारा कब्जा न दिए जाने के कारण 1972 में नगर सेठ द्वारा कब्जा पाने व्यवहार वाद बिलासपुर एडीजे कोर्ट में दायर किया गया।

एडीजे कोर्ट ने खारिज किया था प्रकरण, सुप्रीम कोर्ट तक गया मामला

वह व्यवहार वाद 1977 में यूसीएमएस यूएसए को मुख्तियार के माध्यम से और मुख्तियार को संपत्ति बेचने अधिकार न मानते हुए एडीजे ने खारिज कर दिया। उसके बाद अग्रवाल ने 1977 में एमपी हाइकोर्ट में अपील की। अपील पर 25 सिंतबर 1980 में वे हार गए। फिर 1980 में अग्रवाल सुप्रीमकोर्ट गए और 27 मार्च 1991 को सुप्रीम कोर्ट ने प्रकरण को रिमांड ( प्रतिप्रेषित) करते हुए दोबारा बिलासपुर एडीजे के पास भेज दिया। साथ ही सुप्रीमकोर्ट द्वारा एडीजे को निर्देशित किया गया कि अतिरिक्त साक्ष्य लेते हुए और विदेशी दस्तावेजों में मुख्तियारनामा को साक्ष्य में शामिल कर भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के तहत प्रकरण का निराकरण करे। इसके बाद एडीजे कोर्ट ने फिर से सुनवाई की। जिसमे यूसीएमएस यूएसए जो उक्त संपत्ति के मालिक है परंतु जो विदेशी दस्तावेज थें उन्हें एडीजे ने विचारार्थ स्वीकर न करते हुए माना कि मुख्तियार एफसी जोनाथन को उक्त संपत्ति को नगर सेठ को बेचने का अधिकार नहीं था। उसके बाद इस आदेश के ख़िलाफ़ अग्रवाल ने एमपी हाइकोर्ट में दोबारा 1992 में अपील प्रस्तुत की।

मुख्तियार नामा विदेश के नोटरी द्वारा अभिप्रमाणित, दूतावास से भेजा गया

प्रकरण छत्तीसगढ हाइकोर्ट बनने के बाद 2000 में एमपी से छत्तीसगढ़ ट्रांसफर हो गया। अब जाकर प्रकरण में फिर सुनवाई हुई। अग्रवाल परिवार की ओर से अधिवक्ता अंकित पांडेय ने पैरवी की। जस्टिस एनके व्यास ने सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि विदेश में जो मुख्तियारनामा निष्पादित किया गया है उसे विदेश के नोटरी द्वारा अभिप्रमाणित किया गया है। जो यूएसए स्थित भारतीय दूतावास द्वारा भेजा गया। वह यहां भारत में मान्य है, क्योंकि इस प्रकरण में एफसी जोनाथन को नोटराइज्ड कर मुख्तियार बनाया गया था। इसी आधार पर एडीजे द्वारा दिए गए फैसले को पलटते हुए अपील मंजूर की गई और आईसीसीडीसी चर्च को संपत्ति का कब्जा सेठ को सौंपने का आदेश दिया गया ।

Story Loader