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CG High Court: रिश्वत केस में ईएसआईसी मैनेजर को राहत, 20 साल पुराने मामले में हाईकोर्ट ने सजा रद्द की, जानें

High Court: बिलासपुर हाईकोर्ट ने रिश्वत मामले में अहम फैसला सुनाते हुए ईएसआईसी के तत्कालीन मैनेजर हेमेन्द्र वर्मा को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने के आरोप को संदेह से परे साबित नहीं कर सका, इसलिए ट्रायल कोर्ट का फैसला टिक नहीं सकता।

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Bilaspur High Court

Bilaspur High Court(photo-patrika)

CG High Court: बिलासपुर हाईकोर्ट ने रिश्वत मामले में अहम फैसला सुनाते हुए ईएसआईसी के तत्कालीन मैनेजर हेमेन्द्र वर्मा को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने के आरोप को संदेह से परे साबित नहीं कर सका, इसलिए ट्रायल कोर्ट का फैसला टिक नहीं सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने आपराधिक अपील में सुनाया। अदालत ने विशेष सीबीआई न्यायालय रायपुर द्वारा 2 दिसंबर 2005 को सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए आरोपी को संदेह का लाभ दिया।

क्या था मामला

मामले के अनुसार हेमेन्द्र वर्मा उस समय ईएसआईसी बिलासपुर में मैनेजर के पद पर पदस्थ थे। अभियोजन के अनुसार जगमल चौक स्थित मनोज बेकरी के संचालक मनोज अग्रवाल से ईएसआई अंशदान के कथित 60 हजार रुपए के बकाया को कम या समाप्त करने के बदले 10 हजार रुपए रिश्वत मांगी गई थी। शिकायत मिलने के बाद सीबीआई की एसीबी टीम ने 16 अक्टूबर 2001 को ट्रैप की कार्रवाई की। उनके बैग से रिश्वत की रकम बरामद की गई।

क्यों रद्द की सजा

अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने का स्पष्ट और भरोसेमंद प्रमाण पेश नहीं कर पाया। शिकायतकर्ता ने अपने बयान में यह स्पष्ट नहीं कहा कि उसने आरोपी को रिश्वत के तौर पर पैसे दिए थे। ट्रैप कार्रवाई में शामिल कई गवाहों ने भी रिश्वत मांगने की बात स्वयं सुनने से इनकार किया। ईएसआई बकाया के संबंध में भी पर्याप्त दस्तावेजी आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में रिश्वत की मांग (डिमांड) साबित होना अनिवार्य शर्त है।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा

रायपुर स्थित सीबीआई के विशेष न्यायालय ने 2005 में आरोपी को दोषी मानते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 तथा धारा 13(1)(डी) व 13(2) के तहत एक-एक वर्ष के कठोर कारावास और 20-20 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी।