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बिलासपुर

कोटा मेरा कार्यक्षेत्र है टिकट मिले तब भी न मिले तब भी – जया सिंह जूदेव

आम महिला हूं, कुकिंग, निटिंग मुझे भी पसंद हैं...

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बिलासपुर . मेरे काका दिलीप सिंह जूदेव वो शख्शियत हैं जिन्होंने धर्म को जीवन का अभिन्न हिस्सा माना। हमारे महल के मुख्य-द्वार पर धर्म रक्षा का दृढ़ वाक्य दर्ज है। वे महत्वाकांक्षी नहीं बल्कि इन टू द पब्लिक मिजाज के नेता थे। उनकी विरासत बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है। यह कहना है जूदेव परिवार की बहू जया सिंह जूदेव का। जया चुनावी राजनीति में आती हैं, तो वे परिवार की चौथी सदस्य होंगी। जया भाजपा की ओर से कोटा से दावेदारी कर रही हैं। उनका कहना है, जो मैंने नमो इंडिया और अखिल भारतीय क्षत्रीय महासभा में किया है, वह मेरे समर्पण को सिद्ध करता है। वे गुरुवार को पत्रिका के प्रतिष्ठित साक्षात्कार कार्यक्रम कॉफी टॉक विद पत्रिका की हिस्सा बनीं।

कोटा ही क्यों?
जशपुर की तीनों सीटें आरक्षित हैं। प्रजातंत्र में जन ही सब हैं। कोटा से मेरा आना जाना रहा और यहां से लगाव है। कमजोर नेतृत्व के कारण कोटा आज तक अपेक्षित है। यहां कइयों ऐसे गांव हैं जहां जाने के लिए मुझे ही ट्रैक्टर का सहारा लेना पड़ा। न रास्ते, न रोड। स्थानीय नेतृत्व ने लोगों की बात को पूरी तरह से रखा ही नहीं। जबकि यह राज्य का महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

कुमार साब के जनसेवा भाव को निभाना है
काका दिलीप सिंह जूदेव देश की बड़ी धरोहर हैं। उनके जीवन को बहुत व्यापक दृष्टिकोण से देखना होगा। वे राजनीति के ही नहीं, बल्कि सामाजिक क्षेत्र की ऐसी शख्शियत रहे हैं, जो सबकी सेवा के लिए सदैव तत्पर रहते थे। राजवंश के इतर अगर देखें तो वे एक जनसेवक थे। उनके बाकी रह गए कार्यों को हम सबको पूरा करना है।

भाजपा क्यों भरोसा करे, आप कांग्रेस में रही हैं
कांग्रेस में मैं बहुत कम समय रही। यह जीवन की सबसे बड़ी भूल है। मैं इस गलती को पौंछना चाहती हूं। कोटा से इच्छा जताई है। टिकट मिले तो भी न मिले तो भी वहां से हर सूरत में भाजपा को जिताना है। मैं चाहती हूं यहां भी आदिवासी कल्याण आश्रम खुले।

आम महिला हूं, कुकिंग, निटिंग मुझे भी पसंद हैं…
मैं एक आम महिला हूं। बेडमिंटन की खिलाड़ी रही हूं। कुकिंग, गार्डनिंग, सिलाई, कढ़ाई और स्वेटर निटिंग अच्छे लगते हैं। फिल्म और साहित्य में भीरुचि है। अमिताभ, मधुबाला पसंदीदा हैं। सुसंस्कृत एक आम महिला की तरह ही मेरा भी जीवन है।

रामायण मुझे सबसे ज्यादा प्रिय…
रामायण हमारा सर्वोच्च ग्रंथ है। मैं नियमित अध्ययन करती हूं। इसके अनुरूप ही भारतीय परिवारों को चलना चाहिए। यह भारत की पहचान है। हम नारियों का सम्मान करने वाले देश हैं। ऐसे में देश में पद्मावत जैसी फिल्में बनना दुर्भाग्यजनक है। इसमें खिल्जी का गीत तो कोई एतिहासिक दस्तावेज पर भी आधारित नहीं।