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उस वक्त गल्र्स स्टूडेंट के नाम के सामने मिस लगाना पड़ता था, प्यार तो छोडि़ए

मशीनों का इस्तेमाल तो भरपूर हो, लेकिन इन पर निर्भता कम से कम। मौजूदा स्वास्थ्य में डायग्नोस पार्ट बढ़ गया है।

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उस वक्त गल्र्स स्टूडेंट के नाम के सामने मिस लगाना पड़ता था, प्यार तो छोडि़ए

बिलासपुर. डॉक्टर को अपने अनुभव और ज्ञान का मिश्रण बनाकर काम करना चाहिए। मशीनों का इस्तेमाल तो भरपूर हो, लेकिन इन पर निर्भता कम से कम। मौजूदा स्वास्थ्य में डायग्नोस पार्ट बढ़ गया है। यह महत्वपूर्ण है, लेकिन एक खर्चीली प्रक्रिया है। कई बार पेशेंट इसे गैरजरूरी मान लेते हैं तब यहीं से डॉक्टर और मरीज के बीच अविश्वास पनपता है। यही वजह टकराव की बनती है। यह कहना है अपोलो हॉस्पिटल के सीओओ (चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर) डॉ सजल सेन का। डॉ. सेन कॉफी टॉक विद पत्रिका में भाग लेने बुधवार को पत्रिका ऑफिस पहुंचे।

मेडिकल एजुकेशन में मील का पत्थर है नीट : मेडिकल प्रवेश के लिए नीट चिकित्सा शिक्षा में मील का पत्थर है। इसके लागू होने से प्राइवेट कॉलेजों में गड़बड़ी, सीटों की खरीद-फरोख्त रुकी है। इस बात से जरूर दिक्कत होती है कि कोई मेधावी छात्र एक-दो अंकों से रह जाए तो उसके पास कोई चारा नहीं, परंतु प्रवेश प्रक्रिया में क्षमता केंद्रित पारदर्शिता आई है।

अपोलो सोशल कम्युनिकेशन में आगे : अपोलो ऑर्गेनाइजेशन पीआर, मार्केटिंग से जुड़े लोगों के साथ गेवरा, दीपका जैसी छोटी जगहों पर चिकित्सा कैंप लगाता है। समय-समय पर राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय स्तर के सीनियर स्पेश्लिस्ट के प्रोग्राम कराए जाते हैं, ताकि डॉक्टरों को कु छ नया सीखने को मिले। गनियारी चिकित्सा केंद्र से आने वाले मरीजों और उनके परिजनों के रहने, खाने और चिकित्सा के इंतजाम किए गए हैं। अपोलो सोशल कम्युनिकेशन और डॉक्टर्स अपग्रेडेशन के लिए कंटीन्यू काम करता है।

मरीज-डॉक्टर के बीच बात ज्यादा हो : आज के दौर में मेडिकल प्रोफेशन में सॉफ्ट स्किल्स की कमी है। टेक्नॉलाजी के कारण डॉक्टर और पेशेंटशिप को धक्का लगा है। मशीनों पर निर्भरता होने से मरीज-डॉक्टर के बीच संवाद कम हुआ है। डायग्नोस ज्यादा है। यह जरूरी है, लेकिन साथ में मरीज से बातचीत भी करना चाहिए। अगर संवाद कायमी हो जाए तो अप्रिय स्थितियां नहीं बनेंगी और क्रेडिबिलिटी पर भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

पीजी पर फोकस करने की जरूरत : छत्तीसगढ़ में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। सरकार को पीजी की सीटें बढ़ाए। बीते कुछ सालों में प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ी है। हम पहले 150 ग्रेजुएट्स निकालते थे, जबकि जरूरत 700 की थी। इससे यह कमी पूरी हुई है, लेकिन पीजी में अभी और भी बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत है।

गीत गजल का शौक, खेल के लिए समय नहीं देखकर खुश होता हूं : खाली वक्त में इंग्लिश लिट्रेचर, नॉवेल और गीत, गजल का शौक है। गाता हूं और हारमोनियम बजाता हूं। फिलवक्त पत्नी और मैं समय के अनुसार गीत गाते हैं। अच्छा लगता है, हालांकि अभी किसी सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर कोई गीत-गजल नहीं डाले हैं। खेल-कूद का पहले शौक था। फुटबॉल के लिए क्रेजी हूं। लेकिन समय ज्यादा नहीं है।

क्रश तो छोडि़ए, गल्र्स स्टूडेंट के नाम के आगे मिस बोलते थे : जब मैं पढ़ रहा था तो वक्त अलग था। बहुत औपचारिकताएं थी। हम लोग लड़कियों को मिस कहकर बुलाते थे। लड़कियां लड़कों के नाम से आगे मिस्टर लगाती थी। ऐसे में कहां संभव थी मुहब्बत। हालांकि कालांतर में मेडिकल आउटसाइड प्यार परवान चढ़ा। (मुस्कुराते हुए) हम आज साथ हैं। गीत-गजल को दिलोजान से चाहने वाले डॉ. सेन ने कार्यक्रम में दुष्यंत कुमार की साए में धूप की एक गजल गुनगुनाई।

वॉकिंग लाख रोग की एक दवा : फिट रहने के लिए कुछ न कर सकें तो वॉकिंग जरूर करें। यह लाख रोगों की एक दवा है। व्यस्तताएं ऐसी ही रहने वाली हैं, सारी चीजें वैसी ही रहेंगी, इसीमें से समय निकालें और कम से कम 4 से 5 किलोमीटर वॉकिंग जरूर करें।