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जरा याद करो कुर्बानी…पहले लड़े थे अंग्रेजों से अब लचर व्यवस्था से जूझ रहा फ्रीडम फाइटर का परिवार

Freedom fighters: जब जीवित थे उस वक्त 15 अगस्त और 26 जनवरी के एक दिन पहले किए जाते थे याद(freedom fighters of india)

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Freedom fighters Family Struggling with poverty in Bilaspur

जरा याद करो कुर्बानी...पहले लड़े थे अंग्रेजों से अब लचर व्यवस्था से जूझ रहा फ्रीडम फाइटर का परिवार

बिलासपुर. आजादी की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी(Freedom fighters) का परिवार आज सरकार की अनदेखी के कारण गरीबी से जूझ रहा हैं। सरकार द्वारा उनके(freedom fighters of india) जीवनयापन के लिए कोई सुविधा प्रदान नहीं की गई। न ही उन्हें कोई नौकरी मिली और न ही रहने का ठिकाना(freedom fighters information)। गरीबी की हालात में जैसे-तैसे अपना जीवन बसर कर रहे हैं। नेता और मंत्री सिर्फ चुनाव के समय ही उनकी सुध लेते हैं और बड़े-बड़े वादे कर भूल जाते हैं। चुनाव के बाद कोई उनको झांकने तक नहीं आता। शहर के खपरगंज में रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रहलाद पीपलवा की पत्नि कावेरी बाई पीपलवा ने बताया कि सन् 1942 में मेरे पति स्कूल की पढ़ाई कर रहे थे। उन्हीं दिनों देश में आंदोलन और हड़ताल का दौर चल रहा था। भारत छोड़ो आंदोलन अपने पूरे शबाब पर था। अंग्रेजों ने आंदोलन को कमजोर करने महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया था। जिसकी आग पूरे देश में फैल चुकी थी। इसकी सूचना महाराष्ट्र के वर्धा जिले के बलगांव शहर में हाईस्कूल की पढ़ाई करने वाले प्रहलाद पीपलवा तक पहुंची। उनके नेतृत्व में पूरे स्कूल के छात्र अंग्रेजों के खिलाफ हो गए और चंद घंटों में ही अंग्रेज सरकार की संचार व्यवस्था को बर्बाद कर दिया। घटना कुछ दिन बाद ही अंग्रेज अफसर ने उन्हें गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलवाया तथा दो साल के लिए करावास में डाल दिया। सजा पूरी कर उन्होंने आगे पढऩे की कोशिश की लेकिन ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विरोध करने पर उनका शाला में प्रवेश नहीं हो पाया। सन् 1944 में स्कूल में दाखिल मिला जहां पर उन्होंने मैट्रिक तक पढ़ाई की। आजादी के बाद पूरा परिवार बिलासपुर शहर में आकर बस गया। 17 जनवरी 2006 में 86 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया। उनके शवयात्रा में कांग्रेस नेता बैजनाथ चंद्राकर और महापौर राजेश पाण्डेय ही पहुंचे थे।

होटल और मुनीम गिरी का किया काम
प्रहलाद पीपलवा के 67 वर्षीय बड़े बेटे श्याम सुंदर पीपलवा ने बताया कि आजादी मिलने के बाद पूरे परिवार के साथ बिलासपुर में आकर बस गए। सदर बाजार स्थित किशन चौक के पास छोटा से होटल खोलकर उसी से परिवार का भरण-पोषण करते थे। कुछ दिनों बाद वह भी दुकान बंद हो गई। गोल बाजार स्थित मालिकराम मेलाराम किराना दुकान में मुनीम बनकर जीवन यापन करते थे। बुजुर्ग हो जाने पर उन्होंने काम करना बंद कर दिया। थोड़ी बहुत जो पेंशन मिलती थी उसी से परिवार का भरण-पोषण हो रहा था।

सरकार की तरफ से कोई राहत नहीं
प्रहलाद पीपलवा की 86 वर्षीय पत्नी कावेरी बाई पीपलवा ने बताया कि सरकार से आज तक कोई मदद नहीं मिला है। उनके जीवित रहते समय 15 अगस्त और 26 जनवरी को सम्मान देने बुलाया जाता था, लेकिन अब वहां भी हमारी कोई इज्जत नहीं हैं। अपने परिवार के साथ आज भी टूटे-फूटे घर में जीवनयापन करने को मजबूर हैं। मैंने कई बार कलेक्टर, नेता और अधिकारियों को शिकायत की है। लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। सरकार अस्पताल में भी कोई सुविधा नहीं दी जाती है। इतनी उम्र होने के बाद भी मुझे अन्य लोगों की तरह लाइन लगाकर डॉक्टर का इंतजार करना पड़ता है।

हाईकोर्ट के आदेश का नहीं हो रहा है पालन
प्रहलाद पीपलवा के छोटे बेटे संतोष पीपलवा ने बताया कि डॉ रमन सिंह ने राजीव प्लाजा में एक दुकान देने का निर्देश दिया तथा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी निर्देशित किया था। इसके बावजूद आज तक उन्हें दुकान आवंटित नहीं किया गया है। इसके अलावा यदुनंदन नगर में जमीन भी दिलाने का वादा किया गया था। इतने दिन गुजर जाने के बाद भी जमीन नहीं मिल पाई हैं। इसके लिए कई बार प्रशासनिक अधिकारी व नेताओं से मिल चुके हैं।

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