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क्या पुलिस की गवाही पर भरोसा किया जा सकता है? नक्सल केस में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दिया बड़ा जवाब

Police Witness: अदालत ने कहा कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में केवल सरकारी गवाह होने के आधार पर पुलिस अधिकारियों की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।
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High Court Judgment

नक्सल मामलों में हाईकोर्ट का बड़ा संदेश (photo source- Patrika)

High Court Judgment: नक्सल प्रभावित इलाकों में होने वाले मामलों की सुनवाई को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर पुलिस अधिकारियों की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता कि वे सरकारी गवाह हैं। यदि उनके बयान विश्वसनीय, सुसंगत और अन्य साक्ष्यों से पुष्ट हों तो अदालत उन पर पूरा भरोसा कर सकती है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने नक्सलियों को विस्फोटक सामग्री उपलब्ध कराने से जुड़े दो मामलों में दोषियों की अपीलें खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखा। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।

Bhairamgarh Naxal Case: भैरमगढ़ मामले में डेटोनेटर बरामद, सजा बरकरार

पहला मामला बीजापुर जिले के भैरमगढ़ क्षेत्र का है। यहां पुलिस ने एक आरोपी को गिरफ्तार किया था, जिसके कब्जे से इलेक्ट्रिक डेटोनेटर बरामद हुआ था। आरोपी की निशानदेही पर अन्य विस्फोटक सामग्री भी जब्त की गई थी। हाईकोर्ट ने माना कि बरामदगी, आरोपी के बयान और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य एक मजबूत साक्ष्य श्रृंखला तैयार करते हैं। इसलिए विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 10 वर्ष और 5 वर्ष की सजा में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।

'नक्सल इलाकों में हर बार स्वतंत्र गवाह मिलना संभव नहीं'

फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि नक्सल प्रभावित दुर्गम क्षेत्रों में हर मामले में स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी या आम नागरिक गवाह मिलना संभव नहीं होता। ऐसे मामलों में यदि पुलिस अधिकारियों की गवाही विश्वसनीय है और अन्य साक्ष्यों से उसकी पुष्टि होती है, तो उसे केवल सरकारी गवाह होने के कारण संदेह की नजर से नहीं देखा जा सकता। अदालत ने माना कि न्यायालय का दायित्व गवाह की विश्वसनीयता को परखना है, न कि केवल उसके सरकारी कर्मचारी होने के आधार पर उसे अस्वीकार कर देना।

आरोपी डेटोनेटर मिलने का जवाब नहीं दे सका

अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि आरोपी यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि उसकी व्यक्तिगत तलाशी के दौरान बरामद इलेक्ट्रिक डेटोनेटर उसके पास कैसे आया। गुप्त सूचना के आधार पर हुई कार्रवाई, बरामदगी और आरोपी की निशानदेही पर मिली अतिरिक्त विस्फोटक सामग्री उसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य हैं।

यूएपीए से बरी होने का नहीं मिला फायदा

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी आरोपी को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) या भारतीय दंड संहिता (IPC) की कुछ धाराओं से राहत मिल जाती है, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत उपलब्ध स्वतंत्र साक्ष्य स्वतः कमजोर हो जाते हैं। यदि विस्फोटक रखने, ले जाने या उपयोग से जुड़े अपराध प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित कानून के तहत दोषसिद्धि कायम रह सकती है।

Chhattisgarh High Court: बेलपोच्चा जंगल मामले में भी राहत नहीं

दूसरा मामला बेलपोच्चा जंगल का था। यहां तीन आरोपियों के कब्जे से बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेटर, जिलेटिन रॉड, कॉर्डेक्स वायर, बैटरियां और अन्य विस्फोटक सामग्री बरामद की गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि गुप्त सूचना, बरामद सामग्री और अन्य साक्ष्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि आरोपी प्रतिबंधित माओवादी संगठन की गतिविधियों में सहयोग कर रहे थे। इसलिए उनकी सजा में किसी प्रकार की राहत देने का कोई औचित्य नहीं बनता।

जांच और ट्रायल प्रक्रिया को भी सही माना

खंडपीठ ने कहा कि दोनों मामलों में जांच एजेंसियों ने कानून के अनुसार आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन किया। ट्रायल कोर्ट ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन करने के बाद फैसला सुनाया था। रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो कि जांच में गंभीर त्रुटि हुई हो या साक्ष्यों का गलत आकलन किया गया हो। इन सभी तथ्यों के आधार पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दोनों आपराधिक अपीलों को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया। साथ ही दोषियों को ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई शेष सजा पूरी करने के निर्देश भी दिए।