
बिलासपुर. गौरक्षा, हिंदू केंद्रित शिक्षा और राम मंदिर पर मोदी सरकार से उम्मीद करना भावुकता से अधिक कुछ नहीं। संघ को चाहिए कि वह भारत की परिकल्पना देश के सामने रखे, किसी राजनीतिक दल से उम्मीद न बांधे। उसकी परिकल्पना में जो सही फिट हो संघ उसका समर्थन करे। अटल हों या मोदी, इन्होंने वही किया जो कोई भी राजा करता। राज्य के पास संपत्ति और सेना की बड़ी शक्ति होती है, जिसके सामने संघ के मलाई चाटने वालों को छोड़ दें तो शेष लाचार नजर आते हैं। मैंने मोहन भागवत से कहा था करीब सालभर पहले कि आप भारत की परिकल्पना रखो, भाजपा से उम्मीद मत रखो। वे इससे सहमत भी थे, परंतु अब तक कुछ इस दिशा में दिखा नहीं। यह बातें पत्रिका के साथ एक्सक्लूसिव साक्षात्कार में जगद्गुरु पुरी मठ के शंकराचार्य स्वामी निश्लचलानंद सरस्वती ने कहीं।
राजनीति में धर्म का बेजा इस्तेमाल है, क्या ये ठीक है?
धर्म एक विशाल अवधारणा है। राजनीति उसका एक अंश है। हमारी वैदिक, पौराणिक परंपरा में धर्म के बिना राजनीति संभव नहीं है। नेहरू ने भारत साधु समाज की परिकल्पना रखी। इसका काम तबके ग्रहमंत्री गुलजारी लाल नंदा को दिया। उन्होंने यहां तक कहा कि जो साधु इस संस्था के साथ नहीं है, वह भिखारी है। इस संस्था में कई धन-मान वाले लोग चले गए। कांग्रेस के प्रचारक बन गए। बाद में यही कॉन्सेप्ट विश्व हिंदू परिषद ने धर्म संसद के नाम पर उठाया। तब फिर एक वर्ग भाजपा के गुणगान में लग गया। यह दरअसल करपात्री जी महाराज के विशाल गौ-आंदोलन को नुकसान पहुंचाने के लिए किया गया था।
धर्मगुरुओं की भूमिका क्या होनी चाहिए?
जितनी व्यास पीठें मुगलों और अंग्रेजों के जमाने में उपेक्षित नहीं रहीं उतनी आजाद भारत में हैं। हैदराबाद के नवाब ने तो शंकारचार्यों को सरकारी स्तर पर शाही स्वागत का तक आदेश दिया था। अंग्रेज कुटिल थे, लेकिन उन्होंने भी व्यास पीठ व्यवस्था को नहीं छेड़ा, क्योंकि ऐसी असली-नकली व्यवस्था की बात करते तो फिर उनके पादरी, इमामों का क्या होता। वे भी इस दायरे में आते। पोप सिर्फ धर्म गुरु नहीं हैं, वे वेटिकन के राजा भी हैं राष्ट्राध्यक्ष भी। दुनिया के 204 मुल्कों की राज्य व्यवस्था को उठाकर देखिए, कहीं बाइबिल से तो कहीं कुरान से व्यवस्था चल रही है। जब वहां ऐसा हो सकता है तो भारत में क्यों नहीं हम महाभारत, वाल्मीकी रामायण या मनु स्मृति से व्यवस्था संचालित कर सकते हैं। दलाईलामा एक उदाहरण हैं।
क्या राजनीति और धर्म की भूमिकाएं स्पष्ट होनी चाहिए?
राजनीति की अंतरराष्ट्रीय परिभाषा तय होनी चाहिए। तब पता चलेगा कि सनातन में राजनीति कितनी व्यापक और परिष्कृत मानी गई है। संयुक्त राष्ट्र से अनुरोध करता हूं कि वे राजनीति को सनातन के संदर्भों से परिभाषित करें। सुसंस्कृत, सुशिक्षित, सुरक्षित, संपन्न, सेवा परायण, स्वस्थ्य, सर्वहित व्यक्ति व समाज की स्थापना ही राजनीति है।
मोदी सरकार के काम-काज पर आपकी क्या राय है?
मैं गुप्त या प्रकट किसी दल का प्रचारक नहीं हूं। किसी की निर्बलता अगर आपके बलवान होने की वजह है तो यह बलवान होना नहीं। अभी के महागठबंधन को भी मैं सही नहीं मानता, यह तो सिर्फ विरोध की बुनियाद पर है। कांग्रेस की असफलता भाजपा की सफलता अगर है तो यह दुर्भाग्य है। आप समझ सकते हैं।
क्या मोदी गौरक्षा, राममंदिर पर आगे बढ़े?
मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले मेरे पास 45 मिनट तक बैठे थे। उन्होंने अपनी 2 या 3 बातें कहीं, शेष मेरी सुनी। उनके बाद अशोक सिंघल आए। उन्होंने कहा मोदी को जिताने में समग्र संत समाज अपनी ताकत झौंक दे तो मंदिर बन जाएगा। तब मैंने उनसे कहा था, मोदी ने गाय, राममंदिर जैसी बातें नहीं की हैं। उनका वाक्य था मुझे गंगा ने बुलाया है, गाय या राम मंदिर नहीं। जब आप जीतने के बाद उनके पास जाओगे तो वे कहेंगे हमें थोड़ा समय दो। फिर वे ताकतवर हो जाएंगे तो आपकी सुनेंगे नहीं, हुआ वही। मोदी ने कह दिया बहुत राम-राम कर रहे हो लो ये मेरा इस्तीफा। ऐसे में मजबूर होकर सब चुप हैं। संघ या साधु समाज के सामने संकट है कि वे सपा-बसपा, कांग्रेस का प्रचार कर नहीं सकते, मजबूरन भाजपा को चुनना पड़ेगा। सिंघल की बात अंतत: भावुकता ही साबित हुई।
हमारे शैक्षणिक ढांचे को कैसे देखते हैं?
शिक्षा तो क्या हमारी रक्षा, उद्योग, सेवा, संविधान की आधार-शिलाएं तक अपनी नहीं तो हम क्या उम्मीद करें। मैकाले की शिक्षा ने सब हृदय और मस्तिष्कों को दूषित कर दिया है। भारत दुनिया का हृदय है, जब यही फेल हो जाएगा तो फिर विश्व कहां रहेगा। फिर भी जो इस शिक्षा के बाद भी कोई परिष्कृत बचेगा वह
उद्धार करेगा।
इस राजनीतिक विकृति को रोकने के लिए आप या संतों को क्या करना चाहिए?
धर्मगुरु बचे नहीं। सब दलों के गुरु बन गए हैं। जो थोड़े बहुत बचे हैं उन्हें प्रताडि़त किया जा रहा है। मैं 26 साल से शंकारचार्य हूं। जरा भी कमजोर होता तो रहना मुश्किल था। इतना प्रताडि़त करती हैं सरकारें। इतिहास गवाह है, रावण जैसे ताकतवर राजा, हिरणकश्यपु जैसे शक्तिशाली राजाओं का नाश भी हुआ है, चाणक्य ने चंद्रगुप्त को बनाया है तो यह व्यवस्थाएं क्या हैं। भारत की संसद, विधानसभाएं खुद दुनिया के सामने साबित कर रही हैं कि लोकतंत्र हमारे यहां विफल है। मेरे असम के एक शिष्य डीजीपी थे उन्होंने कहा कि मैं एक अराजक व्यक्ति को जेल में डालना चाहता था, लेकिन वह प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गया। तो लोकतंत्र में तो यह संभावना बनी हुई है।
लोकतंत्र पर आपकी राय
धर्म नियंत्रित, पक्षपात विहीन, शोषण मुक्त, सर्वकल्याणकारी राजनीति ही असल राजनीति है। भारत में फिलवक्त संसद, विधानसभाएं असफल साबित हो रही हैं। ऐसा ही अमरिका में भी नजर आया। वहां जब एक व्यक्ति उलूल-जुलूल बातें कर रहा था तभी मुझे लग रहा था कि अगर इस व्यक्ति को चुना गया तो मानना पड़ेगा कि यह बौद्धिक देश नहीं। और वही हुआ। भारत में भी प्रजातंत्र नहीं चल पा रहा। 500 ईशवी पहले भगवान आदि शकराचार्य ने भारत की 4 धार्मिक राजधानियां बनाकर दुनिया की सर्वोच्च व्यवस्था दी थी। हम इसे नहीं संभाल पाए। अंग्रेज तो चाहते ही यह थे। वही हुआ। वे हमारे यहां से राजवंशों को समाप्त कर गए, लेकिन स्वयं के राजवंश महारानी एलिजाबेथ को पोषित करके रखे हुए हैं। जबकि हमारे राजवंशों में सुधार की जरूरत तो थी, परंतु पूरी तरह से उखाड़ फेंकने की नहीं। हमारे पास धर्म आधारित राज्य व्यवस्था के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। हम दर्शन, व्यवहार, विज्ञान हर आधार पर मजबूत व्यवस्था के जनक हैं तो ऐसा कोई कारण नहीं था कि धर्म उपेक्षित हो।