
फिल्म 'फ्रीडम एट मिडनाइट 2' (सोर्स: @nidhi_budha के अकाउंट के द्वारा)
Freedom At Midnight Season 2: निखिल आडवाणी की फेमस पीरियड ड्रामा सीरीज 'फ्रीडम एट मिडनाइट' का दूसरा सीजन रिलीज हो चुका है। जहां पहले सीजन का अंत एक आक्रोशित देश की चेतावनी के साथ हुआ था, जिसमें "गांधी को कीमत चुकानी होगी" डायलॉग थी, तो वहीं दूसरा सीजन उस भयावह ऐतिहासिक घटना पर बेस्ड है जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था यानी महात्मा गांधी की हत्या। बता दें, आज ही के दिन (30 जनवरी) राष्ट्रपिता की शहादत के 78 साल पूरे हो रहे हैं और ये सीरीज इस बलिदान को एक नए नजरिए से पेश करती है।
इस सीरीज में भारत की आजादी के बाद के उन 5 महीनों की कहानी दिखाई गई है, जहां एक तरफ 200 साल की गुलामी से मुक्ति का जश्न था, तो दूसरी ओर धर्म के आधार पर देश के विभाजन का गहरा जख्म दिया है। फेमस लेखक सलमान रुश्दी ने अपने उपन्यास 'मिडनाइट्स चिल्ड्रन' में इसे 'सांप-सीढ़ी' के खेल की तरह बताया था, आजादी की सीढ़ी पर चढ़ना और फिर बंटवारे के सांप द्वारा डसा जाना। सीरीज में गांधी की हत्या को इसी खेल के उस झटके के रूप में दिखाया गया है, जहां देश अचानक नीचे गिरता चला जाता है।
फिल्म 'फ्रीडम एट मिडनाइट 2' में दिखाया गया है कि महात्मा गांधी ये जान चुके थे कि उनका अंत करीब है। इसके बाद भी, उन्होंने सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए आमरण अनशन का रास्ता चुना। उनकी लड़ाई सिर्फ दंगाइयों से नहीं थी, बल्कि अपनी ही सरकार (नेहरू और पटेल) से भी थी, ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि भारत बंटवारे की शर्तों को पूरी ईमानदारी से निभाए और पाकिस्तान को उसका हक दे, गांधी का नैतिक कोड राजनीति से कहीं ऊपर था।
इतना ही नहीं, निर्देशक निखिल आडवाणी ने इस सीजन में एक बहुत ही मुख्य पहलू को छुआ है। सीरीज हत्यारे की धार्मिक पहचान से ज्यादा उसके अस्तित्व के संकट पर ध्यान केंद्रित करती है। फिल्म में मदन लाल पाहवा (जिन्होंने गांधी की हत्या की कोशिश की थी) के द्वारा ये दिखाया गया है कि कैसे बंटवारे के रिफ्यूजी अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे थे और पाहवा का गुस्सा सिर्फ गांधी के प्रति नहीं था, बल्कि वो अपनी जमीन और अपने पिता से बिछड़ने के व्यक्तिगत दर्द से भी जूझ रहा था।
सीरीज का एक इमोशनल पार्ट वो है जहां गांधी कलकत्ता के एक दंगाई को सलाह देते हैं, "दूसरों के दर्द पर भी उतने ही आंसू बहाओ जितने अपने पर बहाते हो।" गांधी की आखिरी इच्छा पाकिस्तान जाकर वहां शांति फैलाना था। सीरीज ये सवाल छोड़ती है कि क्या ये हत्या सिर्फ बदला थी, या एक महात्मा को सरहद के उस पार शांति का संदेश ले जाने से रोकने की साजिश? 'फ्रीडम एट मिडनाइट सीजन 2' महज एक ऐतिहासिक ड्रामा नहीं है, बल्कि यह उस महान आत्मा को श्रद्धांजलि है जिसने एक बंटते हुए देश को जोड़ने के लिए सबसे बड़ी कुर्बानी दी, इसे आपको जरूर देखना चाहिए।
Updated on:
30 Jan 2026 12:17 pm
Published on:
30 Jan 2026 12:16 pm

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