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पंकज त्रिपाठी को याद आए बचपन के दिन, बोले: ‘मैंने कीड़े खाए थे’, जानिए क्या थी वजह

पंकज त्रिपाठी ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बचपन के दिनों और गांव के बारे में खुलकर बात की। उन्होंने अपनी एक्टिंग के दम पर करोड़ों फैंस का दिल जीता है। पढ़ने के लिए स्क्रॉल करें।

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Janardan Pandey

Jan 09, 2024

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एक्टर पंकज त्रिपाठी किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। अपनी एक्टिंग के दम पर उन्होंने करोड़ों फैंस का दिल जीता है। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया कि उनका सरनेम त्रिपाठी नहीं बल्कि तिवारी था। इसके साथ ही उन्होंने कीड़े खाने की बात भी बताई।

पंकज त्रिपाठी ने बिहार के गोपालगंज जिले के बेलसंद गाँव में अपना बचपन बिताया। उनके पिताजी किसान और पुजारी थे और उनका पालन-पोषण आम बच्चों के जैसे ही हुआ है। इंडिया टीवी को हाल में दिए इंटरव्यू में पंकज त्रिपाठी ने अपने गाँव के किस्से बताए।

उन्होंने बताया कि कैसे वो साइकिल पर स्टंट्स करके लड़कियों को प्रभावित करने के लिए कोशिशें करते रहते थे। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने तैरना सीखने के लिए कीड़े खा लिए थे।


सुनाया साइकिल स्टंट का रोचक किस्सा
साइकिल स्टंट्स के बारे में बात करते हुए अभिनेता ने बताया, "मैं साइकिल पर स्टंट्स करता था क्योंकि एक लड़का ऐसा स्टंट्स करता था और वह लड़कियों के बीच में पॉपुलर था। मैं उस समय की बात कर रहा हूँ जब मैं स्कूल के 7वीं या 8वीं कक्षा में था। स्कूल में उस समय एक स्लो साइकिल रेस हुई थी जिसने वो रेस जीती थी. और इस तरह वो लड़कियों के बीच में पॉपुलर हो गया। मैंने उसी बात को सीखने की कोशिश की और तय किया कि मैं अगले साल विजेता बनूंगा। लेकिन मैं हार गया, मैं विजेता नहीं बना।"


तैरना सीखने के लिए खाए कीड़े
पंकज ने बचपन के उन दिनों को याद किया जब उन्होंने तैरना सीखने का फैसला लिया। उन्होंने बताया, "मुझे तैरना सीखना था तो हमारे घर के पीछे एक नदी थी। नदी के पानी के ऊपर छोटे काले कीड़े थे तो गाँव के शैतान बच्चे ने मुझे बताया कि अगर मैं इन कीड़ों को खा लूँगा तो मैं तैरना सीख जाऊँगा। तो मैंने उन 10-12 कीड़ों को उठाया और पानी के साथ पी गया।"


तिवारी से त्रिपाठी के पीछे की कहानी
पंकज ने बताया "ऐसा पहली बार होगा जब किसी ने अपने पिताजी को बेटे से नाम मिला होगा। मैं 10वीं कक्षा के एडमिट कार्ड भर रहा था। मेरे चाचा त्रिपाठी उपनाम लेते थे और उन्होंने सरकार में अधिकारी बन गए थे। एक बाबा भी थे जिनका त्रिपाठी सरनेम था वो हिंदी के प्रोफेसर बन गए। जिनका सरनेम तिवारी था वे सभी या तो पुजारी थे या खेती कर रहे थे।
मैं चाहता था कि मैं खेतीबाड़ी या पुजारी न बनूं। तो मैंने फॉर्म में अपना नाम त्रिपाठी लिख दिया। लेकिन फिर मैंने सोचा कि मैं अपने पिताजी का नाम फॉर्म में तिवारी लिख नहीं सकता। तो मैंने उनका भी नाम बदल दिया।"