
बंद सहकारी चीनी मिल का मामला: मिल को घाटे से उभारने की योजना पर नहीं हुआ अमल
बंद सहकारी चीनी मिल का मामला: मिल को घाटे से उभारने की योजना पर नहीं हुआ अमल
केशवरायपाटन. बंद बड़ी सहकारी चीनी मिल को घाटे से उभारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाना क्षेत्र के लिए घातक सिद्ध हो गया। यह मिल वर्ष 1980 के बाद से ही घाटे में जाने लगी जो बढ़ते-बढ़ते इतने घाटे में पहुंच गई की उसे बंद करने का निर्णय करना पड़ा। मिल को घाटे से उभारने के लिए समय समय पर योजनाएं बनाकर राज्य सरकार को भिजवाई, लेकिन वहां पर ध्यान नहीं दिया गया।
शुरू से राजनीतिक उपेक्षा के शिकार इस मिल को उभारने के लिए सबसे पहले लेवी मुक्त करने की मांग उठाई गई। किसान संगठनों ने मिल को लेवी मुक्त करने का अभियान भी चलाया, लेकिन केन्द्र व राज्य सरकार ने ध्यान नहीं दिया। इस मांग को उठाने के बाद यहां पर गत्ता प्लांट, शराब फैक्ट्री लगाने के सुझाव दिए गए, लेकिन इन सझावोंं पर अमल तक नहीं किया गया। मिल बंद होने के बाद मिल परिसर में स्थित दो बड़े गोदाम भी मिल को अच्छा लाभ दे सकते थे, लेकिन वह लाभ भी मिल प्रशासन नहीं उठा पाया। मिल को उभारने के लिए वैयरा हाउस से मिल ट्रक काटे वाले गेट तक कोटा-दौसा मेगा स्टेट हाइवे के किनारे की भूमि को व्यवसायिक उपयोग में लेने की योजना की आगे नहीं बढ़ पाई।
अल्प आयु में लगी दीमग
किसानों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए स्थापित सहकारी चीनी मिल को डुबोने के लिए मिल शुरू होने के एक दशक बाद ही दीमग लग गई। मिल को किस प्रकार नुकसान पहुंचाया जाए यह षडयंत्र होने लग गया। मिल में गन्ना तुलाई से लेकर शक्कर उत्पादन तक छिजत पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लगातार कुप्रबंधन के शिकार मिल को घर की दीमगें ही चट कर गई। तीन दशन में मिल की गति यह हो गई की उसे आर्थिक मदद मिलना बंद हो गई। कर्जे में डूबने के बाद वित्तीय संस्थाओं ने हाथ खड़े कर दिए।
Published on:
21 Mar 2020 10:16 pm

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