
जवाहर सागर अभयारण्य में बसे जवाहर सागर गांव को ग्राम करौंदी में विस्थापित करने की प्रक्रिया अंतिम पड़ाव पर पहुंचकर अटक गई। विस्थापन की सम्पूर्ण प्रक्रिया पूरी होने के बाद ऐनवक्त पर आवंटित भूमि को वन विभाग ने वन भूमि बताकर अड़ंगा लगा दिया। अब प्रशासन को इस मामले में नए सिरे से कवायद करनी पड़ेगी।
अभयारण्य क्षेत्र में ग्राम जवाहर सागर बसा हुआ है, जिसमें कुल 351 परिवारों की 1500 से अधिक आबादी निवास कर रही है। उक्त आबादी को करौंदी गांव में विस्थापित करने के लिए जिला प्रशासन ने वर्ष 2015 में सरकार को भूमि आवंटन के प्रस्ताव भेजे थे।
मंजूरी के बाद तत्कालीन जिला कलक्टर ने 5 फरवरी 2016 को ग्राम करौंदी में 140 बीघा भूमि आवंटित कर दी। अब विस्थापन की प्रक्रिया अन्तिम चरण में थी कि हाल ही में वन विभाग ने जिला प्रशासन को पत्र भेजकर करौंदी में आवंटित भूमि को वन क्षेत्र में बताते हुए वहां पर आबादी विस्थापित व अन्य कार्यों पर रोक लगा दी। ऐसे में समूची प्रक्रिया ठप हो गई है।
बरती है लापरवाही
सूत्रों के अनुसार वर्षों पूर्व करौंदी में वन विभाग को भूमि दी गई थी। जिसे राजस्व रिकार्ड में दर्ज नहीं किया गया। वर्ष 2013 में जिला प्रशासन की इस मामले में बैठक हुई थी। जिसमें सभी जिला अधिकारी सहित वन विभाग के अधिकारी भी थे। बैठक में ग्राम करौंदी में भूमि आवंटन की सहमति बनी थी, लेकिन किसी ने भी वन भूमि का जिक्र नहीं किया। लापरवाही के चलते समय रहते सरकारी रिकार्ड में वन भूमि इंद्राज नहीं की गई। गत 2 जनवरी 2017 को वन विभाग ने सरकारी रिकार्ड में वन भूमि का म्यूटेशन दर्ज करने की प्रशासन के समक्ष अर्जी लगाई। तब जाकर आपत्ति का पता चला।
पत्रिका व्यू: आखिर कौन जिम्मेदार?
वन क्षेत्र में बसी आबादी को दूसरे गांव में विस्थापित करने के लिए वर्षों तक प्रक्रिया चली। सरकार से मंजूरी भी मिल गई और जिला स्तर पर सभी तैयारियां पूरी कर ली गई। अब जैसे ही काम शुरू करने की बारी आई तो वन विभाग ने वन भूमि बताते हुए काम में अड़ंगा डाल दिया। अचानक वन विभाग की इस आपत्ति से प्रशासिनक अधिकारी सकते में आ गए। किसी को यह समझ नहीं आया कि सरकार से जिला स्तर तक प्रक्रिया पूरी होने तक वन विभाग के अधिकारी वर्षों तक क्यों चुप्पी साधे रहे?।
सरकारी बैठकों में शामिल होने के बाद भी वन विभाग के अधिकारियों ने आवंटित की गई भूमि वन क्षेत्र में होने की बात प्रशासन को नहीं बताई। अब वन भूमि का मामला सामने आने से प्रक्रिया अटकना तय है और नए सिरे से पूरी कवायद करनी पड़ेगी। अब देखना यह कि प्रशासन इस मामले में किसे जिम्मेदार मानता है और किस पर कार्रवाई करता है?। अन्यथा आगे भी जनहित के ऐसे मामलों में लापरवाही बदस्तूर जारी रहेगी।
जीएसएस बनने लगा तो जागा वन विभाग
ग्राम करौंदी में जयपुर विद्युत वितरण निगम को 132 के.वी. जीएसएस निर्माण के लिए 22 बीघा भूमि आवंटित हुई थी। यहां पर जीएसएस के लिए चारदीवारी का निर्माण का कार्य आधे से ज्यादा होने के बाद वन विभाग हरकत में आया और वन भूमि पर निर्माण बताते हुए काम रुकवा दिया। इसके बाद वन विभाग ने आवंटित भूमि पर आपत्ति जताई।
धरी रह गई तैयारियां
जवाहर सागर गांव की आबादी को ग्राम करौंदी में विस्थापित करने के लिए जिला प्रशासन ने सभी तैयारियां पूरी कर ली थी। कोटा टाउन प्लानर ने भी लोगों को बसाने के लिए भूखण्डों सहित अन्य विकास कार्यों को अन्तिम रूप दे दिया था, लेकिन अब सभी तैयारियां धरी रह गई है।
करौंदी में जवाहर सागर की आबादी को विस्थापित करने के लिए सरकार से मंजूरी मिली थी। विस्थापन की प्रक्रिया भी अन्तिम चरण में है, लेकिन अब वन विभाग आवंटित भूमि को वन भूमि बता रहा है। सरकारी रिकार्ड में वर्षों से तक उक्त भूमि, वन भूमि में दर्ज नहीं की गई। बैठकों में भी वन क्षेत्र में भूमि होने का जिक्र नहीं किया। इस मामले में जानकारी नहीं देने वाले वन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए जयपुर पत्र भेजा है।
नरेश कुमार ठकराल, जिला कलक्टर बूंदी.
Published on:
09 Feb 2017 05:47 pm
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