
सुरक्षा राजोरा :बूंदी. कुदरत ने उससे मां बनने का हक तो छीन लिया, लेकिन कलेजे को ममता से भर डाला... बधाइयां बांटते-बांटते जब एक रोज बेटी जनने का दर्द आंखों के आगे तारी हुआ तो उसका भी आंचल भी छलक उठा... वात्सल्य की ऐसी सरिता बही कि एक किन्नर भी मां बन गई। बेटी का नाम रखा शेषा... और शेष जिंदगी उसके लालन-पालन को समर्पित कर दी।
३५ बसंत देख चुकी काजल को पूरा शहर बुआ कहता था... एक भी घर ऐसा नहीं है जिसमें खुशियों के साथ बुआ के कदम न पड़ें... ढ़ाई साल पहले जब ऐसी ही बधाई के बीच तीन बेटियों को जनने की रुलाई फूटी तो काजल का आंचल ममता से भर उठा... और उसमें झूम उठी एक बेटी की किलकारी। काजल अब मां बन चुकी है... उसके आंगन में भी मां के नाम की गूंज गूंज रही है। नन्ही शेषा के लिए काजल सिर्फ और सिर्फ मां है... भले ही समाज उसे किन्नर कह कर पुकारे। हालांकि किन्नरों के बीच काजल का यह फैसला एक मिसाल बन चुका है।
बूंदी की काजल बुआ किन्नर हैं। ढाई साल पहले मां बनने का अहसास उनके चेहरे पर साफ झलकता है। नन्ही परी को जब उन्होनें अपने हृदय से लगाया तो लगा जैसे जिदंगी का खाली पन दूर हो गया हो। ज्यो ही नन्ही जान शेषा ने किन्नर मां का आंचल छूआ वात्सलय की सरीता बह उठी। अब काजल बुआ अपनी बेटी शेषा की परवरिश में जी जान लगा रही है ताकि बेटी बडी होकर अपने भविष्य को संवार सके। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं के नारे से मिली प्रेरणा के बाद काजल बुआ ने एक बेटी को गोद लेकर समाज को एक दिशा दी है। समाज में किन्नरों के प्रति सोच को बदलते हुए काजल बुआ अपने समुदाय में एक मिसाल बनी है। वे कहती है कि जब पहली बार मां कह कर शेषा ने पुकारा तो लगा मेरे जीने का मकसद ही पूरा हो गया। उसका मां बोलना मेरे जीवन में वो ख़ुशी लाया, जिसकी वजह से आज मैं जी रही हूं।
ऐसे बनी काजल यशोदा मां-
काजल बुआ ने जिस बेटी को गोद लिया वह परिवार भी समाज का एक ऐसा ही रूप है, जहां बेटी को बोझ ही समझा जाता है। तीन बेटिया जन्मी तो मानो दुखा का पहाड़ टूट पड़ा। यह बात जब काजल बुआ को पता चली तो बेबस मां के कलेजे के टूकड़े को पालने का जिम्मा उठाया और कानूनी तौर पर गोद ले लिया। सुनने में ये बात भले ही अजीब लगे, लेकिन ये एक बेहद ही संवेदनशील और भावुक कर देने वाली मां की एक ऐसी ही कहानी है।
काजल बुआ बताती हैं कि समाज द्वारा किन्नर को मां के रूप में स्वीकारा जाना बेहद चुनौती पूर्ण था। बच्ची को गोद लेने के बाद भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ। किन्नर समाज के लोग ही कहते थे कि ये ताली बजाएगी या बच्ची को पालेगी। लेकिन मासूम शेषा की परवरिश में काजल बुआ ने कोई कमी नही रखी। ढाई साल की मासूम काजल बुआ को ही अपनी मां मानती है। उसकी देखभाल के लिए काजल किन्नर ने अपने ही काम से दूरियां बना ली। अस्तित्व की लड़ाई के लिए संघर्ष करने वाली यह मां खुश है कि अब उसे शेषा के रूप में बेटी मिली जो उसे आगे की डगर दिखाएगी। वे बताती है कि बेटी शेषा को पढ़ा-लिखाकर सम्मानजनक जीवन देना उनकी जिंदगी का उद्देश्य बन गया है।
काजल बुआ का कहना है कि दूसरे लोग भी बेटियों को लेकर अपनी सोच को बदलें, हम यही चाहते हैं, जब कई लोग हमारे घर आते हैं, तो किसी राजकुमारी की तरह हो रही इस बेटी की परवरिश देखकर हैरान रह जाते हैं। किन्नरों का एक परिवार बेटी को दुलार करता है। पिछले महिनो मासूम शेषा का जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाया। उस दौरान बेटी के प्रति किन्नरों का इतना प्यार देखकर हर कोई अवाक रह गया। एक गोद ली हुई बच्ची की ऐसी परवरिश देखकर शहर के लोग किन्नरों की तारीफ करते नहीं थकते। किन्नरों को समाज की मुख्यधारा से आज भी अलग-थलग समझा जाता है। वे खुद एक जटिल जीवन जीते हैं, लेकिन इसके बावजूद समाज को नया संदेश देने के लिये उन्होंने एक गरीब बेटी की परवरिश का जो बीड़ा अपने कंधों पर उठाया है, वो पूरी मानवता के लिये एक बड़ा सबक बन गया है।
Published on:
14 May 2018 11:27 am
बड़ी खबरें
View Allबूंदी
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
