
उर्दू फारसी छोड़ संस्कृत में भविष्य तलाश रही मुस्लिम छात्रा...
तुम सुनाओ छन्द ‘निराला’ के,
यहां ‘ग़ालिब’ से मेरी पहचान हो.
हिंदी की कलम तु हारी हो,
यहां उर्दू मेरी जुबान हो...
बूंदी. आजादी के 70 साल बाद हिंदुस्तान अब उस दौर से गुजर रहा है जहां रंग ही नहीं जुबानों को भी मजहबी खांचे में बांटने की कोशिश हो रही है। उर्दू-फारसी को मुसलमानों और संस्कृत को हिंदुओं की भाषा का चोगा पहनाने की कोशिशों का मुंहतोड़ जवाब देती नजर आती है बूंदी के शास्त्री नगर की नूर आसमां अंसारी।
संस्कृत से एमए कर रही हाड़ौती की इकलौती मुस्लिम छात्रा का स्लोकों से ऐसा नाता जुड़ा कि हाईस्कूल में संस्कृत में 100 में से 100 अंक लाने का अनूठआ रिकॉर्ड बना डाला। संस्कृत में ही अपना भविष्य बनाने के इरादे से अब वो इसी भाषा से स्नातकोत्तर की पढ़ाई भी कर रही है।
नैनवा रोड़ से शास्त्री नगर को जोड़ती गलियों पर जैसे ही कदम रखेंगे तो संस्कृत के श्लोकों की सुरमई ध्वनि आपके कानों में शहद घोलने लगेगी, लेकिन जैसे ही उस दरवाजे पर नजर डालेंगे जहां से ये आवाज फूट रही है, तो हैरत में पड़ जाएंगे। एक मुस्लिम परिवार और संस्कृत का धाराप्रवाह उच्चारण... जी हां, यह मुक्तलिफ असंारी का ही घर है जिसमें उनकी बेटी नूर आसमां अंसारी संस्कृत को अपनी जिंदगी बना चुकी हैं।
गायत्री परिवार से मिली प्रेरणा
पढ़ाई की शुरुआत मदरसे से करने वाले नूर कहती हैं कि उनके घर से लेकर मुहल्ले तक में उर्दू और फारसी का जोर रहा। शुरुआती पढ़ाई भी मदरसे से की, लेकिन शुरुआती शिक्षा के दौरान ही गायत्री परिवार की ओर से संस्कृत भाषा को लेकर एक प्रतियोगिता कराई गई। जिसमें उन्हें गोल्ड मैडल मिला। बस यहीं से संस्कृत उनके दिलो-दिमाग में बस गई।
संस्कृत को बनाया भविष्य
इसके बाद जब हाईस्कूल में उन्होंने संस्कृत विषय लिया तो नाते-रिश्तेदार ही नहीं शिक्षक भी चौंक पड़े। बड़ा सवाल यह था कि उन्हें घर पर संस्कृत पढ़ाएगा कौन? बावजूद इसके नूर ने हि मत नहीं हारी और इ तेहान में 100 से 100 अंक लाकर पूरे सूबे में रिकॉर्ड कायम कर डाला।
इंटर में 70 और बीए में 65 फीसदी अंक लाने के बाद भी उनका हौसला नहीं डिगा। आखिर में उन्होंने संस्कृत विषय से ही स्नातकोत्तर करने की ठानी। एमए प्रीवियस का रिजल्ट आया तो 75 फीसदी अंक हासिल किए। वो अब संस्कृत से ही बीएड कर संस्कृत की ही शिक्षक बनना चाहती हैं। नूर को गार्गी पुरस्कार भी मिल चुका है।
मदरसे में पढ़ाई जाए संस्कृत
पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों के विरोध में खड़ी नूर आसमां अंसारी कहती हैं कि हिंदुस्तान की जड़ों को जानना है तो संस्कृत पढऩा जरूरी है। सरकार और समाज को कोशिश करनी चाहिए कि मुस्लिम समाज भी इस भाषा को पढ़ और समझ सके, इसलिए मदरसों में भी संस्कृत की पढ़ाई कराई जानी चाहिए।
नूर कहती हैं कि हाड़ौती में संस्कृत विषय से बीएड करने के अवसर बेहद कम हैं। सरकार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए, ताकि हम जैसी लड़कियों को पढ़ाई के लिए बाहर न जाना पड़े।
Published on:
06 Jul 2018 01:20 pm
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