
बुरहानपुर. पृथ्वी की आदि गंगा पुण्य सलिला मां ताप्ती के पावन तट पर बसा बुरहानपुर नगर जिसका इतिहास कई साल पुराना है। यहां के शिवालय रामायण और महाभारत काल से जुड़े है। जिनके प्रति भक्तों की आस्था अपार है। इन मंदिरों से कई कथाएं और कहानियां जुड़ी है। महाशिवरात्रि पर इन मंदिरों पर विशेष रिपोर्ट।
1.
मान्यता... यहां शिवजी की आरती में उपस्थित रहत हैं ब्रह्मा, विषणु महेश
महाजनापेठ में प्राचीनत गुप्तेश्वर मंदिर जिसकी महिमा तापी महापुराण में स्पष्ट दर्शाई गई है। इतिहासकार होशंग हवलदार बताते हैं कि इसकी मान्यता है जब भी महाआरती होती है तो साक्षात ब्रह्मा, विष्णु, महेश यहां उपस्थित होते हैं। इसकी प्राचीनता को बल इस बात से भी मिलता है कि अश्वत्थामा ताप्ती नदी में स्नान कर गुप्तेश्वर के दर्शन कर, इसमें स्थित बिल मार्ग से अर्थात सुरंग से आसा दूर्ग याने असीरगढ़ में जाकर आसीरेश्वर की पूजा अर्चना करते हैं। महाभारत काल के पहले बने हुए शिवालयों में विराजमान नंदीजी के सींग वलयाकार है और इसका प्रमाण उत्तराखंड के पुरातन मंदिरों में भी प्राप्त होता है।
5 हजार साल प्राचीन मंदिर
ंमंदिर 5 हजार साल से भी अधिक प्राचीन है। इसके प्रमाण स्कंद पुराण के अंतर्गत ताप्ती महात्मय कथा में मिलते हैं। यहां के प्राचीन घंटे की गूंज भी लग है। इसे बजाने पर अलग ही गूंज सुनाई देती है। 15 किलो वजनी यह घंटा सदियों से यहां लटका हुआ है।
सिंधिया घराना करता था मंदिर की देखभाल
प्राचीनकाल से बना यह मंदिर रामायण और महाभारत काल का साक्षी है। इसका वर्णन पुराणों में उल्लेखित है। कई राजा महाराजाओं के शासन का भी साक्षी है यह मंदिर। मंदिर की सुरक्षा कई समय तक सिंधिया घराने के हाथ में रही। बाद में यह मंदिर देखरेख के अभाव में जीर्णशीर्ण होने लगा। क्षेत्रवासियों ने मिलकर समिति बनाई और 40 साल पहले इसका जीर्णोद्धार कर मंदिर परिसर में नवग्रह की भी स्थापना की।
शिवरात्रि पर होता है विशेष श्रृंगार
मंदिर में ऐसे तो रोज यहां भक्त पूजन के लिए आते हैं, लेकिन सावन माह और शिवरात्रि पर अधिक आस्था उमड़ती है। शुक्रवार को अभिषेक का दौर दिनभर चलता रहेगा। महाशिवरात्रि पर शिवलिंग का विशेष श्रृंगार किया जाता है।
बीयू1732 : शिवलिंग।
बीयू1733 : प्राचीन गुप्तेश्वर मंदिर।
2.
शाही किला के राजा महाराज यहां करते थे पूजा
मुमताज की यादे सिमटे शाही किला जहां इसके परिसर में प्राचीन शिव मंदिर बना हुआ है। किले में राज करने वाले कई राजा महाराज यहां पूजा करने आते थे। इसी मंदिर में पूजन के लिए अब भक्तों की आस्था उमड़ती है। शिवरात्रि और सावन माह में विशेष पूजन किया जाता है। जहां दर्शन के लिए लंबी कतार भक्तों की लगती है। शुक्रवार को दिनभर यहां विविध आयोजन होंगे और मेल भी लगेगा।
मनकामनेश्वर किला मंदिर में सावन के महीने में पूजा पाठ का सिलसिला सदैव चलता रहता है। यह मंदिर शाही किला के सामने स्थित है। मंदिर की आकृति शिव पिंड के आकार की बनी होने से इसकी भव्यता देखते ही बनती है। यहां बनाए गए मंदिर के उपरी हिस्से में नाग पूरे मंदिर को लपेटे हुए है। एतिहासिक किले के समीप मंदिर होने से किला देखने आने वाले पर्यटक इस मंदिर में भी दर्शन के लिए आते हैं।
बीयू1722 : प्राचीन शिव मंदिर।
बीयू1723 : प्राचीन शिवलिंग।
3.
कई ऋषि मुनियों ने की है यहां शिवलिंग की पूजा
सावन माह में मंदिर यात्रा रविवार को ताप्ती के सतियारा घाट पर बने प्राचीन वाघेश्वर मंदिर की की गई। दरअसल इसके बारे में जानकारी निकाली तो पता चला यह मंदिर वाघेश्वर के नाम से तो जाना जाता है, इसका नाम कामेश्वर भी कहा जाता है। जहां कई ऋषियों और संतों ने मंदिर में बने शिवलिंग का जलाभिषेक कर पूजा अर्चना की है। इस मंदिर की महिमा इसलिए भी बढ़ जाती हैं क्योंकि ताप्ती के तट पर बना हुआ है। जहां ताप्ती स्नान करने के बाद इस मंदिर पर हर भक्त पूजन कर निकलता है। प्राचीन मंदिर की यह खासियत है कि यह मंदिर पूरा पत्थरों से निर्मित है। विशालकाय रूप लिए मंदिर की सुंदरता देखते ही बनती है। मंदिर के चारों और बने वाघ बरबस ही भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इस तरह का विशालकाय शिव मंदिर जिले में कही भी देखने को नहीं मिलेगा।
क्या कहते हैं इतिहासकार
इतिहासकार होशंग हवलदार ने कहा कि इस मंदिर का वर्णन ताप्ती पुराण में वर्णित है। यह मंदिर कामेश्वर के नाम से जाना जाता था। लेकिन बाद में इसका जीर्णोद्धार करने के बाद धीरे-धीरे नाम में बदलाव आ गया। यहां कई ऋषि, संत और राजा महाराजाओं ने पूजा की है। बारिश के मौसम में ताप्ती नदी में बाढ़ आने के बाद ताप्ती के जल से सहज ही इसका जलाभिषेक हो जाता है। इसके परिसर में नंदी बने हुए हैं।
बीयू1734 : सतियारा घाट पर बना वाघेश्वर मंदिर।
बीयू1735 : शिवलिंग।
4.
किदवंती... यहां अश्वतथामा आते हैं शिवजी की पूजा करने
जिला मुख्यालय से 22 किमी दूर असीरगढ़ किले पर बना पांच हजार साल से भी अधिक प्राचीन असीरेश्वर मंदिर। ऐसी किदवंती है कि जहां महाभारतकाल के अश्वत्थामा शिवजी की पूजा करने आते हैं। दुनिया का सबसे बढ़ा रहस्य अपने में समेटे असीरगढ़ किला उत्तर दिशा में सतपुड़ा पहाडियों के शिखर पर समुद्र तल से 750 फुट की ऊंचाई पर है। यह दुर्गम किला देखकर हर किसी की आंखें इस पर टिक जाती है। जब यहां लोग पहुंचकर शिव मंदिर में अश्वत्थामा द्वारा की जा रही पूजन के बारे में सुनते हैं तो हैरत में पड़ जाते हैं। इसे जानने के लिए मप्र के अलावा अन्य राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं। अब यहां सावन के माह में भी पहुंचकर शिवजी की पूजा अर्चना कर रहे हैं। शिवरात्रि पर यहां भक्त दर्शन को पहुंचेंगे।
मंदिर पर आते हैं हजारों भक्त
इस प्राचीन शिव मंदिर पर दर्शन करने के लिए हजारों भक्त आते हैं। सबसे अधिक सावन माह में यहां भक्तों का तांता लगता है। जहां श्रद्धा कावड़ यात्रा भी शहर से निकलकर असीरेश्वर शिव मंदिर में शिवलिंग का अभिषेक करती है। इसके अलावा महाशिवरात्रि पर भी भक्त दर्शन को पहुंचते हैं।
ऐसा है इतिहास
बताया जाता है कि हैहेय वंशी राजा आशा अहीर ने यह किला बनाया था। जहां पर शिव मंदिर बना हुआ है। इसका जिक्र तापी महापुराण में दिया हुआ है। किदवंती है कि अजय अमर अश्वत्थामा आज भी ताप्ती नदी में स्नान कर गुप्तेश्वर मंदिर के बिल रास्ते से निकलकर असीरगढ़ किले पर पहुंचते हैं। इनकी पूजा का प्रमाण यह है कि शिवलिंग पर ताजा फूल चढ़ा होता है और यह फूल बहुत अनोखा होता हैं, यह उन्होंने खुद भी देखा है।
बीयू1736/37 : प्राचीन शिव मंदिर।
द ग्रेटमहादजी शिंदे ने 250 साल पहले स्थापित किया था शिवलिंग
राजघाटरोडपर बना प्राचीन मंदिर। इसका इतिहास 250 साल पुराना है।जब बुरहानपुर में मराठा शासक की ओर से देश की खुशहाली के लिए 11 शिवलिंग स्थापित किए थे। इसमें से एक मंदिर है राज राजेश्वर मंदिर। जहां आज भी मंदिर निर्माण की कलाकृति से प्राचीन मंदिर होने का प्रमाण मिलता है।
1760 में द ग्रेट मराठा सरकार महादजी शिंदे ने इसका निर्माण कराया था।शहर में ऐसे 11 मंदिर बनाए गए हैं, इसमें राज राजेश्वर मंदिर के आसपास ही 4 मंदिर बने हैं। राज राजेश्वर मंदिर का नाम भी इसलिए पड़ा क्योंकि यह राजा ने मंदिर बनाया था। मंदिर का निर्माण करने के बाद महादजी ने इसकी व्यवस्था के लिए बुरहानपुर में सबसे बड़े जमीनदार रहे नाना साहब को जिम्मेदारी सौंपी। उनकी मृत्यु के बाद भीकन भट्ट अग्निहोत्री को कार्यभार दिया। इसके बाद उनके पुत्र रामचंद्र अग्निहोत्री फिर मुझे इसकी व्यवस्था सौंपी गई।
ऐसा हैमहादजी का इतिहास
महादजी 1730 से 1794 तक मराठा साम्राज्य के शासक थे। जिन्होंने ग्वालियर पर शासन किया।वे सरदार रानोजी राव शिंदे के पांचवें पुत्र थे। शिंदे अथवा सिंधिया वंश के संस्थापक रानोजी शिंदे के पुत्रों में केवल महादजी पानीपत के तृतीय युद्ध से जीवित बच सके थे।
यहां लगता हैभक्तों का तांता
प्राचीन मंदिर होने से यहां बड़ी संख्या में भक्तों का तांता लगता है।महाशिवरात्रि पर शिवजी का विशेष श्रृंगार किया जाता है, जो देखते ही बनता है। श्रृंगार सामग्री भी प्राचीन समय से चली आ रही है। इसी मंदिर में राम भगवान का मंदिर भी है।
बीयू1727 : प्राचीन शिव मंदिर।
नागर समाज के कुलदेवता है हाटकेश्वर देव
बुरहानपुर. प्रतापपुरा स्थित भगवान शिवजी का मंदिर। देखने में यह दूर से कोई धर्मशाला या किसी का निवास नजर आता है। लेकिन जब यहां जाए तो पता चलता है कि यहां प्राचीन शिव मंदिर है, जो हाटकेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। जब इसके बारे में जानकारी ली तो पता चला की यह नागर समाज के कुलदेवता है। जहां समाज की विशेष आस्था जुड़ी है।
हाटकेश्वर मंदिर में सैकड़ों भक्त दर्शन को पहुंचते हैं, लेकिन विशेषकर नागर समाज का ज्यादा लगाव इस मंदिर है क्योंकि हाटकेश्वर देवता इनके कुल देवता माने गए हैं। ऐसा बताया गया है कि हाटकेश्वर देव का मंदिर ऐसा कोई शहर नहीं जहां पर नहीं हो। सभी दूर समाज के लोग रहने से यह मंदिर बना हुआ है। सावन माह और शिवरात्रि पर नागर समाज के लोग इस मंदिर में आकर अनुष्ठान करते हैं।
इसलिए है कुलदेवता
नागर ब्राह्मण समाज के कुलदेवता हाटकेश्वर महादेव का सबसे प्राचीन मंदिर गुजरात में शंखतीर्थ के पास वडनगऱ में विराजित है। पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्माजी ने (हाटक) स्वर्ण से शिविलिंग बनाकर उसका पूजन किया और हाटकेश्वर तीर्थस्थल स्थापित किया। उन्होंने गुजरात के उस क्षेत्र के ब्राह्मणों को हाटकेश्वर महादेव की पूजा की प्रेरणा दी। इसके बाद से हाटकेश्वर देव की स्थापना जगह-जगह होने लगी।
बीयू1730/31 : शिव मंदिर और शिव लिंग।
द ग्रेट महादजी शिंदे ने 250 साल पहले स्थापित किया था शिवलिंग
राजघाट रोड पर बना प्राचीन मंदिर। इसका इतिहास 250 साल पुराना है। जब बुरहानपुर में मराठा शासक की ओर से देश की खुशहाली के लिए 11 शिवलिंग स्थापित किए थे। इसमें से एक मंदिर है राज राजेश्वर मंदिर। जहां आज भी मंदिर निर्माण की कलाकृति से प्राचीन मंदिर होने का प्रमाण मिलता है।
1760 में द ग्रेट मराठा सरकार महादजी शिंदे ने इसका निर्माण कराया था। शहर में ऐसे 11 मंदिर बनाए गए हैं, इसमें राज राजेश्वर मंदिर के आसपास ही 4 मंदिर बने हैं। राज राजेश्वर मंदिर का नाम भी इसलिए पड़ा क्योंकि यह राजा ने मंदिर बनाया था। मंदिर का निर्माण करने के बाद महादजी ने इसकी व्यवस्था के लिए बुरहानपुर में सबसे बड़े जमीनदार रहे नाना साहब को जिम्मेदारी सौंपी। उनकी मृत्यु के बाद भीकन भट्ट अग्निहोत्री को कार्यभार दिया। इसके बाद उनके पुत्र रामचंद्र अग्निहोत्री फिर मुझे इसकी व्यवस्था सौंपी गई।
ऐसा है महादजी का इतिहास
महादजी 1730 से 1794 तक मराठा साम्राज्य के शासक थे। जिन्होंने ग्वालियर पर शासन किया। वे सरदार रानोजी राव शिंदे के पांचवें पुत्र थे। शिंदे अथवा सिंधिया वंश के संस्थापक रानोजी शिंदे के पुत्रों में केवल महादजी पानीपत के तृतीय युद्ध से जीवित बच सके थे।
यहां लगता है भक्तों का तांता
प्राचीन मंदिर होने से यहां बड़ी संख्या में भक्तों का तांता लगता है। महाशिवरात्रि पर शिवजी का विशेष श्रृंगार किया जाता है, जो देखते ही बनता है। श्रृंगार सामग्री भी प्राचीन समय से चली आ रही है। इसी मंदिर में राम भगवान का मंदिर भी है।
बीयू1727 : प्राचीन शिव मंदिर।
Published on:
18 Feb 2023 07:47 pm

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