
क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है। (PC: AI)
अमरीका-इजरायल और ईरान के बीच टकराव शुरू होने के बाद सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। सिर्फ सोमवार को ही क्रूड ऑयल की कीमत 25 फीसदी से अधिक उछल गई। इससे दुनिया भर के बाजारों में चिंता बढ़ गई है। वहीं, कई रिपोर्ट्स में इस बात का दावा किया जा रहा है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मज अगर लंबे समय तक बंद रहता है तो कच्चे तेल की कीमतें 125 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी पार कर सकती हैं।
इस सैन्य तनाव का सबसे ज्यादा असर अब एशिया की ऊर्जा आपूर्ति पर दिखाई देने लगा है, क्योंकि इस जंग ने तेल और गैस उत्पादन को प्रभावित किया है। इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर उन एशियाई देशों पर पड़ रहा है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। कई जगहों पर ईंधन की कमी, कीमतों में बढ़ोतरी और आपूर्ति में बाधा की स्थिति बनने लगी है। महंगा तेल कई इंडस्ट्रीज के लिए परेशानी बढ़ा सकता है।
हाल ही में गुजरात के मोरबी में टाइल्स इंडस्ट्री ने गैस और एनर्जी की बढ़ती लागत के कारण प्रोडक्शन अस्थायी रूप से रोकने का फैसला किया है। यह इस बात का संकेत है कि ऊर्जा लागत बढ़ने से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर दबाव बढ़ सकता है। इससे इतर, तेल और गैस की कीमतों में उछाल का असर सबसे ज्यादा ऑयल मार्केटिंग कंपनियों, एविएशन कंपनियों, पेंट और केमिकल इंडस्ट्री, टायर कंपनियों, ऑटो और फर्टिलाइजर पर पड़ सकता है।
युद्ध के कुछ ही दिनों के भीतर एशिया के कई हिस्सों में ऊर्जा संकट के संकेत दिखाई देने लगे हैं। बिजली कंपनियों और रिफाइनरियों के पास मौजूद ईंधन का भंडार कम होने लगा है। कुछ औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए ईंधन की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं। सिंगापुर में जहाजों को ईंधन उपलब्ध कराने वाली कंपनियों ने आपूर्ति सीमित करना शुरू कर दिया है। फिलीपींस ने
ऊर्जा बचाने के लिए सरकारी दफ्तरों के कामकाज के दिनों को कम करने का फैसला किया है। वहीं बांग्लादेश ने रमजान के दौरान सड़कों पर होने वाली सजावटी रोशनी को सीमित कर दिया है, ताकि बिजली की खपत कम की जा सके। चीन ने भी घरेलू जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए अपनी रिफाइनरियों से ईंधन निर्यात कम करने को कहा हैं।
ऊर्जा संकट का असर उद्योगों पर भी दिखने लगा है। एशियाई देशों के कारोबारियों का कहना है कि यदि यह स्थिति एक सप्ताह तक और जारी रहती है तो उद्योगों का कामकाज ठप होने का खतरा है। टेक्सटाइल कंपनियां कपड़ों की रंगाई की प्रक्रिया में गैस का उपयोग करती है, लेकिन अब गैस की उपलब्धता कम हो रही है और उत्पादन लागत करीब 35 प्रतिशत तक बढ़ गई है। इसके अलावा कतर और संयुक्त अरब अमीरात में हवाई अड्डों के बंद होने से ग्राहकों तक सैंपल भेजना भी मुश्किल हो गया है।
ऊर्जा संकट का असर कृषि क्षेत्र में भी दिखाई दे रहा है। उत्तरी थाईलैंड में किसान डीजल हासिल करने के लिए पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारों में खड़े हैं। उन्हें डर है कि अगर समय पर ईंधन नहीं मिला तो आने वाली धान की कटाई प्रभावित हो सकती है। ऊर्जा आयात पर निर्भरता के कारण भारत भी इस संकट से प्रभावित हो रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है और इसका लगभग आधा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए आता है। नोमुरा ने कहा, भारतीय रिफाइनरियों ने समुद्र में मौजूद रूसी तेल के कई कार्गो खरीदने शुरू कर दिए हैं। पर यह तेल पहले की तरह सस्ता नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा, मौजूदा हालात में तेल की कीमत से ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि आपूर्ति उपलब्ध रहे।
Published on:
09 Mar 2026 02:43 pm
बड़ी खबरें
View Allकारोबार
ट्रेंडिंग
