
चीनी के भाव काफी बढ़ गए हैं। (PC: AI)
Sugar Price Hike Reason: त्योहारों की मिठास पर महंगाई का रंग चढ़ा हुआ है। चीनी के दाम पिछले एक महीने में तेजी से बढ़े हैं। देश चीनी का खुदरा भाव 21 जुलाई को करीब 45 रुपये किलो था, जो 31 जुलाई तक 50 रुपये पर पहुंच गया। अब यह बढ़कर करीब 65 रुपये किलो पर पहुंच चुका है। यानी महज एक महीने में चीनी करीब 20 रुपये किलो महंगी हो गई है। त्योहारों के मौसम में मिठाई और चॉकलेट की मांग बढ़ने वाली है। ऐसे में आगे कीमतों पर और दबाव बन सकता है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, शुक्रवार को देश में चीनी का औसत खुदरा भाव 65 रुपये प्रति किलो रहा। यह वह कीमत है जिस पर बाजार में सबसे ज्यादा खरीद-बिक्री दर्ज होती है।
सिर्फ खुदरा बाजार में ही कीमतों ने छलांग नहीं लगाई है। चीनी मिलों से निकलने वाली कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है। 20 अगस्त को उत्तर प्रदेश में चीनी का एक्स-फैक्ट्री भाव करीब 57 से 60 रुपये किलो, महाराष्ट्र में 62.5 से 64 रुपये किलो और कर्नाटक में 63 से 64 रुपये किलो था। वहीं, 1 अगस्त को यही भाव उत्तर प्रदेश में 44.95 से 46.70 रुपये, महाराष्ट्र में 46.20 से 46.90 रुपये और कर्नाटक में 46.25 से 47 रुपये किलो के बीच था। यानी चीनी की कीमतों में तेजी केवल खुदरा बाजार तक सीमित नहीं है। मिल स्तर पर भी इसका असर साफ दिखाई दे रहा है।
इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण उम्मीद से कम चीनी उत्पादन और कम शुरुआती स्टॉक बताया जा रहा है। मौजूदा सीजन में चीनी का उत्पादन पहले लगाए गए अनुमान से काफी नीचे रहा है। नवंबर 2025 में इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन यानी ISMA ने 2025-26 सीजन के लिए सकल चीनी उत्पादन करीब 343.5 लाख टन रहने का अनुमान लगाया था। इसमें से करीब 34 लाख टन चीनी को एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल किए जाने के बाद शुद्ध चीनी उत्पादन लगभग 309.5 लाख टन रहने का अनुमान था। लेकिन बाद के आंकड़ों ने तस्वीर बदल दी।
नए उद्योग अनुमान के मुताबिक, इस सीजन में सकल चीनी उत्पादन करीब 309 लाख टन रहा। इसमें से लगभग 30 लाख टन एथेनॉल के लिए इस्तेमाल हुआ। यानी बाजार के लिए करीब 279 लाख टन चीनी बची। यह शुरुआती अनुमान से करीब 30.5 लाख टन कम है।
सीजन की शुरुआत में मिलों के पास करीब 50 लाख टन का शुरुआती स्टॉक था। इसमें मौजूदा सीजन का उत्पादन जोड़ने पर कुल उपलब्ध चीनी करीब 329 लाख टन बैठती है। इसमें से घरेलू खपत के लिए करीब 280 लाख टन और निर्यात के लिए करीब 8 लाख टन घटाने पर सीजन के अंत में करीब 41 लाख टन स्टॉक बचने का अनुमान है। अगर यह आंकड़ा सही रहता है, तो यह 2016-17 के बाद सबसे कम क्लोजिंग स्टॉक होगा। उद्योग के कुछ लोगों का कहना है कि शुरुआती स्टॉक 50.03 लाख टन नहीं, बल्कि करीब 48 लाख टन था। अगर यह आंकड़ा सही है तो सीजन के अंत में स्टॉक करीब 39 लाख टन ही बचेगा, जो 2008-09 के बाद सबसे कम होगा।
उत्पादन अनुमान गलत साबित होने की बड़ी वजह पिछले साल का मौसम भी रहा। सितंबर-अक्टूबर 2025 में महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात के कई हिस्सों में जरूरत से ज्यादा बारिश हुई। इस दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी भी देर से हुई। खेतों में पानी जमा रहने और पर्याप्त धूप नहीं मिलने से गन्ने की फसल पर असर पड़ा। गन्ने की बढ़वार और उसमें सुक्रोज की मात्रा प्रभावित हुई। इसका सीधा असर मिलों की पैदावार और चीनी रिकवरी पर पड़ा।
महाराष्ट्र और कर्नाटक के मामले में अनुमान और वास्तविक उत्पादन के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला। ISMA ने महाराष्ट्र में करीब 130 लाख टन और कर्नाटक में 63.5 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया था। लेकिन उत्पादन क्रमश करीब 99.2 लाख टन और 47.2 लाख टन रहा। उत्तर प्रदेश में भी मिलों का उत्पादन करीब 89.7 लाख टन रहा, जबकि पहले 103.2 लाख टन का अनुमान लगाया गया था।
चीनी की एक्स-फैक्ट्री कीमतों में पिछले कुछ महीनों तक ज्यादा तेजी नहीं थी। महाराष्ट्र में औसत कीमत सितंबर 2025 के 38.31 रुपये किलो से घटकर अप्रैल 2026 में 36.98 रुपये किलो तक आ गई थी। जून में यह बढ़कर 38.23 रुपये किलो हुई। लेकिन जुलाई में तस्वीर अचानक बदल गई। उस महीने औसत कीमत करीब 41.85 रुपये किलो पर पहुंच गई। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार इस तेजी के पीछे दो बड़े कारण रहे। पहला, उत्पादन में उम्मीद से ज्यादा कमी और मिलों के पास वास्तविक स्टॉक को लेकर बनी अनिश्चितता। कुछ आर्थिक दबाव झेल रही मिलों ने सरकार की तय मासिक बिक्री सीमा से ज्यादा चीनी पहले ही बेच दी थी। ऐसे में उनके पास वास्तविक स्टॉक काफी कम बचा था।
दूसरा कारण इस साल का मानसून रहा। जून में महाराष्ट्र और कर्नाटक समेत कई इलाकों में बारिश की कमी ने बाजार को चिंता में डाल दिया। कारोबारियों को डर है कि इसका असर 2026-27 सीजन के गन्ने की पैदावार पर भी पड़ सकता है।
त्योहारों का सीजन करीब आते ही चीनी की मांग बढ़ने की उम्मीद रहती है। इसी को देखते हुए बड़े कारोबारियों, स्टॉकिस्टों और थोक में चीनी खरीदने वाली कंपनियों ने जुलाई से पहले ही खरीदारी शुरू कर दी थी। अगस्त में कुछ चीनी मिलों ने भी ऊंची कीमत की उम्मीद में बाजार में बिक्री धीमी कर दी। जब बाजार में मांग बनी रहे और सप्लाई सीमित हो जाए तो कीमत बढ़ना स्वाभाविक है।
चीनी की कीमत बढ़ने के साथ एथेनॉल का मुद्दा भी चर्चा में है। मौजूदा सीजन में करीब 30 लाख टन चीनी एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल हुई है। पहली नजर में यह आंकड़ा बड़ा लगता है। लेकिन पूरी तस्वीर देखने पर कहानी थोड़ी अलग है। सबसे बड़ी बात यह है कि एथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल होने से पहले ही कुल चीनी उत्पादन शुरुआती अनुमान से करीब 34.5 लाख टन कम रहा। यानी मौजूदा संकट की मुख्य वजह केवल एथेनॉल डायवर्जन को मानना सही नहीं होगा।
नवंबर 2025 से जुलाई 2026 के बीच तेल कंपनियों को ब्लेंडिंग के लिए कुल करीब 810.67 करोड़ लीटर एथेनॉल दिया गया। इसमें गन्ने से बनने वाले एथेनॉल की हिस्सेदारी करीब 32 फीसदी यानी 259.24 करोड़ लीटर थी। बाकी करीब 68 फीसदी एथेनॉल अनाज आधारित स्रोतों से आया। इसमें मक्का, एफसीआई का चावल और टूटे या खराब अनाज शामिल थे। इसलिए चीनी की कीमतों में मौजूदा उछाल की पूरी जिम्मेदारी एथेनॉल के लिए चीनी के इस्तेमाल पर नहीं डाल सकते।
आने वाले महीनों में चीनी की कीमतों पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी। दशहरा 20 अक्टूबर और दिवाली 8 नवंबर को है। इस दौरान मिठाई, चॉकलेट और दूसरे मीठे उत्पादों की मांग बढ़ती है। सरकार की कोशिश है कि आयात, निर्यात पर रोक और स्टॉक लिमिट जैसे कदमों के जरिए घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहे। उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि 2026-27 सीजन में सरकार चीनी की सप्लाई बढ़ाने के लिए एथेनॉल उत्पादन के नियमों में भी बदलाव कर सकती है।
Updated on:
22 Aug 2026 04:46 pm
Published on:
22 Aug 2026 04:30 pm
