
yogeshwar dutt will win gold medal in rio
संजीव शर्मा, चंडीगढ़। हरियाणा के सोनीपत जिले के गांव भैंसवाल कलां की भूमि पर जन्मा मनीष आज देश के लिए योगी बन गया है। मां सुशीला देवी का कहना है कि अब योगी उसका ही नहीं, बल्कि पूरे देश का बेटा है और उसे अपने बेटे पर पूर्ण विश्वास है वह इस बार देश की झोली में स्वर्ण पदक अवश्य डालेगा।
सुशीला देवी ने बताया कि योगेश्वर को वह शिक्षक बनाना चहाते थे। क्योंकि उसके दादा रतिराम एक गांव के स्कूल में पढ़ाते थे। पिता राममेहर ने भी स्कूल में पढ़ाया। मां सुशीला ने बताया कि घरवालों ने उसका नाम मनीष रखा था, लेकिन सब प्यार से योगी बोलने लगे और वहीं नाम आज योगेश्वर हो गए। उसे अपने बेटे योगी के हौंसले को भी टूटने नहीं दिया और हर वक्त उसके हौंसलें को बढ़ाती रही।
मां सुशीला देवी ने कहा कि उसे अच्छी तरह से याद है जब आठ साल की उम्र में ही योगेश्वर के दिमाग में भैंसवाल कलां के बलराज पहलवान प्रेरणा बन गए। यहां से ही उसके बेटे योगी को पहलवान बनने का जोश दिलों-दिमाग में चढ़ गया। ऐसे में योगी बचपन से ही अखाड़े में जाने लगा। मैं नहीं चाहती थी कि उनका बड़ा बेटा अखाड़े में जाकर अपने समय को बर्बाद करे। बचपन में अखाड़े में उनका प्रशिक्षण स्वर्गीय सतबीर सिंह ने देना शुरु कर दिया।
प्रथम बार योगी घर लेकर आया था जीतकर दीवार घड़ी
सुशीला देवी ने बताया कि उसके बेटा योगी 1992 में जब वह पांचवीं में था। तब एक दिन वह घर पर दीवार घड़ी लेकर आया। तब उसे घर वालों ने पूछा तो बोला स्कूल में कुश्ती प्रतियोगिता थी, जिससे जीत कर उसने दीवार घड़ी प्राप्त की है। बस उस दिन योगी के पिता राममेहर का मन बदल गया। वह बेटे को पहलवानी के लिए प्रोत्साहित करने लगे। उसके खाने का ख्याल रखते। खुद सुबह उसे बादाम पीसकर देते। वह उसे हमेशा जीतकर आने के लिए प्रेरित करते थे।
दुखों में भी नहीं टूटा योगी का हौंसला
देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर नाम पहलवान योगेश्वर दत्त पर भी दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। लेकिन दुख की घड़ी में भी योगी ने अपना हौंसला नहीं तोड़ा। जब दोहा में 2006 में एशियाड खेल चल रहे थे। योगेश्वर के जाने के नौ दिन बाद ही अचानक पिता चल बसे। योगेश्वर पर दुख का पहाड़ टूट चुका था, क्योंकि उनको पहलवान बनाने में पिता ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उस समय उनके घुटने में चोट भी लग गई। भावनात्मक और शारीरिक रूप से बुरी तरह से आहत होने के बाद भी उन्होंने कुश्ती जीती और देश के लिए कांस्य पदक लेकर आए। पहला गोल्ड मेडल 2003 में कॉमनवेल्थ गेम्स में आया। उसके बाद पदक कभी रुके नहीं। वर्ष 2013 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया। 2014 में ग्लासगो के कॉमनवेल्थ में वे फिर गोल्ड मेडल लेकर आए।
आज अखाड़े में उतरेगा भैंसवाल का छोरा, देश की उम्मीद, योगेश्वर दत्त
सोनीपत के गांव भैंसवाल कलां का छोरा व देश की उम्मीद पहलवान योगेश्वर दत्त आज अखाड़े में उतरेंगा। योगेश्वर पर पूरे देश की उम्मीद टिकी हुई है। जहां योगेश्वर ने लंदन ओलंपिक में 60 किग्रा भार वर्ग में ब्रॉन्ज मेडल जीता था। वहीं इस बार ब्राजील की मेजबानी में चल रहे रियो ओलंपिक में वह 65 किग्रा भारवर्ग में मुकाबले लड़ेगें। योगेश्वर दत्त का मुकाबला आज होगा।
लंदन में योगेश्वर दत्त ने अपने देश के तिरेंगे को लहराने का काम किया था। भारत की ओर से कुश्ती में मेडल जीतने वाले तीसरे पहलवान हैं। सबसे पहले 1952 के ओलंपिक खेलों में भारत के खशब जाधव ने ब्रॉन्ज जीता था। फिर 2008 के बीजिंग ओलंपिक में पहलवान सुशील कुमार ने ब्रॉन्ज जीता था और लंदन में 2012 में ब्रॉन्ज मेडल पर कब्जा जमाया।
कुछ यूं चल रहा है योगी का सिक्का
योगी ने सबसे पहले 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में भी भाग लिया था, लेकिन वह क्वार्टरफाइनल में हारकर बाहर हो गए थे। इसकी भरपाई उन्होंने लंदन ओलिंपिक 2012 में की और 60 किग्रा भार वर्ग में ब्रॉन्ज जीता। उनके नाम एशियाई खेलों में मेडल हैं। उन्होंने इंचियोन 2014 में 65 किग्रा भार वर्ग में एशियाई खेलों में गोल्ड जीता था। इससे पहले वह दोहा एशियाई खेल 2006 में 60 किलो भार वर्ग में ब्रॉन्ज जीत चुके थे। कॉमनवेल्थ खेलों में योगेश्वर के रिकॉर्ड का भारत में कोई सानी नहीं है। उन्होंने दिल्ली कॉमनवेल्थ खेल 2010 और ग्लास्गो कॉमनवेल्थ खेल 2014 में गोल्ड जीता था। योगेश्वर की उलब्धियों को देखते हुए उन्हें 2012 में राजीव गांधी खेल रत्न भी मिल चुका है।
Published on:
20 Aug 2016 05:33 pm
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