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AIADMK refuses alliance with BJP : अन्नाद्रमुक का ‘अटल’ इरादा, भाजपा से गठबंधन नहीं

अन्नाद्रमुक ने भाजपा से गठबंधन से इनकार किया है। यह तमिलनाडु में सत्ता संतुलन को बदल सकता है, क्योंकि दोनों दल आमतौर पर एक साथ चुनाव लड़ते हैं। AIADMK refuses alliance with BJP, big change in Tamil Nadu politics.

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AIADMK refuses alliance with BJP : अन्नाद्रमुक का 'अटल' इरादा, भाजपा से गठबंधन नहीं

AIADMK refuses alliance with BJP : अन्नाद्रमुक का 'अटल' इरादा, भाजपा से गठबंधन नहीं

चेन्नई. आधिकारिक रूप से भाजपा (bjp) और अन्नाद्रमुक (Aiadmk) गठबंधन के समाप्त हुए करीब एक महीना बीत चुका है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के. अन्नामलै के अलावा सभी नेताओं को आशा है कि दोनों पार्टियां फिर एकजुट होकर चुनाव लड़ेगी लेकिन तमिलनाडु विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष और अन्नाद्रमुक महासचिव ईके पलनीस्वामी का इरादा अटल है कि दोनों पार्टियों के बीच आगे गठबंधन नहीं होगा।

ईपीएस ने यह शंखनाद पार्टी के 52वें स्थापना दिवस पर जिला सचिवों और अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ हुई बैठक में किया है। उन्होंने पार्टी नेताओं को निर्देश दिया है कि निचले स्तर के सभी कार्यकर्ता पार्टी हाईकमान के इस निर्णय से अवगत रहें और लोकसभा चुनाव में सभी चालीस सीटों पर जीत के लिए कमर कस लें।


प्रदेश भाजपाध्यक्ष अन्नामलै के द्रविड़ नेताओं पर की जा रही टिप्पणियों की पृष्ठभूमि में अन्नाद्रमुक ने गठबंधन तोडऩे की घोषणा की थी। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष वीपी दुरैसामी ने मीडिया से एक-दो बार वार्ता में कहा था कि दोनों पार्टियां फिर एक साथ आएंगी लेकिन अब लगता है कि अन्नाद्रमुक ने अपना मार्ग तय कर चुकी है।

ऐसे में भाजपा खेेमे में हलचल स्वाभाविक है। वैसे अन्नामलै के मिशन तमिलनाडु की बात की जाए तो वे अकेले चुनाव लडऩे में ज्यादा रुचिकर थे और शायद इस घोषणा से उनको फर्क नहीं पड़े। लेकिन गत दो बार के आम चुनाव की बात करें तो गठबंधन होने के बाद भी भाजपा केवल एक ही सीट जीत पाई थी।


2014 के लोकसभा चुनाव में पोन राधाकृष्णन कन्याकुमारी से जीते थे और 2019 के चुनाव में उनको हार का सामना करना पड़ा था। 2014 में पार्टी का गठबंधन काफी मजबूत था। त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति थी जिसका फायदा मत विभाजन के रूप में भाजपा को मिला था लेकिन 2019 के परिवेश में स्थिति बदली। अन्नाद्रमुक नीत गठबंधन और जयललिता के गुजर जाने के बाद वाले इस चुनाव में पूरा गठबंधन ही बिखर गया। केवल तेनी की एकमात्र अन्नाद्रमुक के हाथ लगी थी। गठबंधन की अन्य पार्टियां खाता भी नहीं खोल सकीं।

बेहतर प्रदर्शन की रणनीति


रणनीतिकारों की मानें तो तमिलनाडु में केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ असंतोष को अन्नाद्रमुक भांप चुकी है। संभवत: यही वजह है कि उसने स्वयं को अन्नाद्रमुक से अलग कर लिया है। गठबंधन समाप्ति की घोषणा के तुरंत बाद विधानसभा के मानसून सत्र में पार्टी ने अल्पसंख्यक कैदियों को रिहा करने की मांग रखते हुए अपनी नीति को स्पष्ट कर दिया कि वह इस तबके को नाराज नहीं करना चाहती। तमिलनाडु के लोकसभा चुनाव में अल्पसंख्यकों और दलितों के वोट निर्णायक साबित होंगे। इन वोटों को रिझाने के लिए ही अन्नाद्रमुक ने भाजपा से पल्ला झाड़ा है।

2009 वाले हाल


अन्नाद्रमुक के इस कड़े कदम के बाद अब भाजपा को अपनी रणनीति फिर से तय करनी पड़ेगी। पीएमके अध्यक्ष डा. अन्बुमणि रामदास की मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से एक भेंट हो चुकी है। चुनाव के वक्त कोई भी भेंट शिष्टाचार के नाते नहीं होती। ऐसे में पीएमके के भी पाला बदलने की उम्मीद हैं। वहीं, डीएमडीके का अभी तक का संकेत भाजपा के साथ बने रहने का है। पार्टी कोषाध्यक्ष प्रेमलता विजयकांत का राज्यपाल से मिलना और सरकारी योजनाओं के अमलीकरण में उनके दखल की मांग करने को इससे जोड़कर देखा जा सकता है। अगर ये दोनों पार्टियां भाजपा से किनारा कर जाती हैं तो भाजपा को 2009 की तरह अकेले ही चुनाव लडऩा पड़ेगा। AIADMK refuses alliance with BJP , big change in Tamil Nadu politics.