
शरीर अशाश्वत, आत्मा शाश्वत
चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर में आचार्य महाश्रमण ने ‘ठाणं’ आगम आधारित प्रवचन शृंखला के क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सर्व जीवों को शरीर के आधार पर छह विभागों में बांटा गया हैं। शरीर पांच होते हैं लेकिन यह नियम औदारिक शरीर पर ही लागू होता है।
आचार्य ने कहा शरीर आत्मा से जुड़ा हुआ हैं, पांचों शरीर का अपना स्वभाव हैं, औदारिक शरीर में रहने वाली आत्मा ही केवलज्ञान को प्राप्त कर मोक्षगामी बन सकती हैं। वैक्रिय शरीर वाला अपनी अवगाहना छोटी, बड़ी बना सकता है। मृत्यु के समय औदारिक शरीर ही रहता है, वैक्रिय शरीर कपूर की भांति उड़ जाता है। आहारक शरीर विशिष्टता का शरीर है। यह विशिष्ट योगी, चौदह पूर्वधारी साधु का हो सकता है। तेेजस शरीर पाचन शक्ति का साधन है। लब्धि के रूप में तेजस शरीर का उपयोग होता है। कार्मण शरीर कर्मों का बन्धा हुआ पिंडी रूप हैं, इसे कर्मक शरीर भी कहते है। जीव की आत्मा एक गति से दूसरी गति में जाने के समय (अन्तराल गति) तेजस और कार्मण दो शरीर ही होते है। संसारी जीवों के तीन शरीर होते ही है। तेजस और कर्मण शरीर संसारी आत्मा के सच्चे मित्र है। ये छूटते नहीं है और छूटने के बाद आत्मा मोक्ष में चली जाती है। इन पांच शरीर के सिवाय छठा विभाग है अशरीरी का जो सिद्ध आत्माओं के होता है । अशरीरी पूरी तरह से अकेले रहते है। अंतराल गति में तेजस और कार्मण दोनों रहते है। संसारी जीवों के औदारिक, तेजस, कार्मण तीनों होते हैं, पर इसमें औदारिक शरीर को मुख्य मान लिया गया है। शरीर और आत्मा का योग है। शरीर अशाश्वत हैं, आत्मा शाश्वत है। अध्यात्म की साधना का मूल लक्ष्य है, मोक्ष की प्राप्ति।
जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संस्कार निर्माण शिविर के संभागी शिविरार्थियों से आचार्य ने प्रश्नोत्तर किये उन्होंने सही समाधान भी दिया।
साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा ने कहा कि यह एक विद्वता की बात है कि प्रश्नकर्ता के प्रश्न का उत्तर समझ में नहीं आए तो जो वास्तव में पण्डित होते हैं, विद्वान होते हैं, वे समय पर अपना असार्मथ्य भी स्वीकार कर लेते है। साध्वी ने कहा कि श्रावक गुरु और चारित्रात्माओं की उपासना करते हैं। जिनके मन में धर्म की लगन होती हैं, उनकी यही अभिलाषा होती है वे संसार से भटकाव से दूर हो आध्यात्मिकता की ओर जाना चाहते है।
Published on:
13 Oct 2018 11:37 am
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