
DR.LALITH KUMAR, EYE SPECIALIST
चेन्नई. देश में हर साल 50,000 नेत्रदान किए जाते हैं। तमिलनाडु से हर साल करीब 8,000 नेत्रदान हो रहे हैं और इस लिहाज से यह देश में पहले स्थान पर है। विशेषज्ञों का कहना है कि नेत्रदान करने वालों की भारी कमी है। महामारी के दौरान बहुत कम नेत्रदान हुए। हर साल एक लाख से अधिक लोगों को प्रत्यारोपण की जरुरत होती है और केवल 50,000 लोग ही अपनी आंखें दान कर रहे हैं। यह संख्या हर महीने बढ़ती रहती है। जागरूकता की कमी के कारण देश को नेत्रदान में कमी का सामना करना पड़ रहा है।
नेत्र दाता किसी भी उम्र का हो सकता है
एक नेत्र दाता किसी भी उम्र का हो सकता है। हालांकि एड्स, हेपेटाइटिस बी, टेटनस, हैजा समेत कुछ संक्रामक बीमारियों वाले नेत्रदान नहीं कर सकते। नेत्रदान मृत्यु के चार से छह घंटे के भीतर किया जाता है। दूसरी ओर विशेषज्ञों ने कहा कि कोविड के चलते लोगों में डर था। इसके अलावा दानदाताओं की कमी का एक बड़ा कारण यह भी है कि लोग किसी शिविर या अस्पताल में पंजीकरण के बाद अपने परिवार या दोस्तों को सूचित नहीं करते हैं।
20 लाख लोग कॉर्निया की क्षति के कारण अंधेपन से पीड़ित
भारत में अनुमानित 20 लाख लोग कॉर्निया की क्षति के कारण अंधेपन से पीड़ित हैं। इनमें से एक चौथाई से अधिक मामलों को समय पर प्रत्यारोपण के साथ हल किया जा सकता है। हर साल हजारों नए मामलों के साथ कॉर्नियल प्रत्यारोपण की मांग बढ़ रही है।
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कोरोना काल में देश में केवल 25 फीसदी ही हुए नेत्रदान
नेत्रदान घटने के कई कारण है। कोरोना काल में देश में करीब 25 फीसदी नेत्रदान ही हुए। कोरोना काल में लोगों में इस बात का डर था कि नेत्रदान से कहीं संक्रमण न फैल जाएं। वहीं जिनकी मौत कोरोना के चलते हुई उनके नेत्रदान नहीं किए जा सकते थे। इसके साथ ही इस दौरान आंख को निकाल कर उसे स्टोरेज करना भी मुश्किल हो रहा था। कई जगह मैनपॉवर की कमी थी।
- डॉ. एस. ललित कुमार, नेत्र रोग विशेषज्ञ, अमृत हॉस्पिटल, चेन्नई।
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Published on:
08 Sept 2021 11:23 pm
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