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Tamilnadu: कम्प्यूटर युग में भी बना हुआ है सर्कस का वजूद

प्राचीन कला को रखे हैं जीवंत, एक शताब्दी की यात्रा पूरी की है ग्रेट बोम्बे सर्कस (Great Bombay Circus) ने

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Great Bombay Circus are few more great Indian circus company

Great Bombay Circus are few more great Indian circus company

चेन्नई. आज भले ही हम कम्प्यूट एवं मोबाइल के युग में पहुंच गए हो लेकिन सर्कस से हमारा नाता आज भी बना हुआ है। सर्कस में जानवरों पर प्रतिबंध के बावजूद लोग चाव से सर्कस देखते हैं।
आज भी फिल्मों के बाद सर्कस मनोरंजन का प्रमुख साधन बना हुआ है। तरह-तरह की परेशानियों के बावजूद सर्कस चालू है और लोगों का मनोरंजन करा रहा है। इस तरह सर्कस में हम प्राचीन कला को जीवंत देख सकते हैं।
इन दिनों चेन्नई महानगर में मूर मार्केट के पास ग्रेट बोम्बे सर्कस चल रहा है। जहां विदेशी कलाकारों की भरमार है।

सर्कस चलाना आजकल बहुत मेहनत का काम

ग्रेट बोम्बे सर्कस के संजीव के.एम. कहते हैं, सर्कस चलाना आजकल बहुत मेहनत का काम है। ग्रेट बोम्बे सर्कस इन दिनों शताब्दी मना रहा है। वर्ष 1920 में दि ग्रेट बोम्बे सर्कस की शुरुआत हुई थी। आज सौ साल बाद भी सर्कस के शो लगातार चालू है। यह अपने आप में मिसाल है।
सर्कस में विविधता देखने को मिल रही है। भारतीय कलाकारों के साथ ही विदेशी कलाकार हैरतअंगेज कारनामे दिखा रहे हैं। इथोपिया के कलाकारों का एक्रोबेटिक्स देखते ही बनता है। रसियन कलाकारों के तलवार पर नंगे पैर चलना, कांच पर चलना एवं फायर डांस लोगों को दांतों तले अंगुली दबाने पर विवश कर देता है। चाइना के कलाकारों की रोलर एक्रेबेट्स भी गजब का है। मणिपुर के कलाकारों का पिरामिड बनाना हो या फिर अन्य कलाकारों की अलग-अलग प्रस्तुतियां। हर किसी का मन मोह लेते हैं।
इस तरह हुई शुरुआत सर्कस की
प्राचीन रोम में भी सर्कस हुआ करते थे। बाद में जिप्सियों ने इस खेल को यूरोप तक पहुंचाया। लंदन में 9 जनवरी 1768 को सर्कस का शो दिखाया था। उसने घोड़ों के साथ कुत्तों के खेल को भी सर्कस में स्थान दिया। पहली बार दर्शकों को हंसाने के लिए उसने सर्कस में जोकर को जोड़ा। इंग्लैंड के जॉन बिल रिकेट्स अमेरिका में 3 अप्रैल 1793 को अपना दल लेकर पहुंचे और वहां के लोगों को सर्कस का अद्भुत खेल दिखाया। रूस के सर्कस बहुत अच्छे माने जाते हैं और वहां 1927 में मास्को सर्कस स्कूल की स्थापना हुई।
जानवरों पर लगा दिया था प्रतिबंध
प्राचीन काल से ही सर्कस से जानवर जुड़े हैं। इनके खेल दर्शक सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। परंतु सर्कस की कठिन दिनचर्या और ट्रेनिंग जानवरों के लिए बड़ी तकलीफदेह होती है। इसी को लेकर सर्कस में जानवरों के प्रदर्शन पर विरोध होने लगा और पेटा सहित अन्य संगठनों के प्रदर्शन के बाद कई देशों में जानवरों के सर्कस में प्रयोग पर पाबंदी लगने लगी। 1990 में भारत में सुप्रीम कोर्ट ने सर्कस में जंगली जानवरों के प्रयोग पर रोक लगा दी थी। तब से कुछ ही जानवर सर्कस में प्रयोग होते हैं और उन्हें भी बैन करने की मुहिम चलाई जा रही है। ग्रीस पहला यूरोपियन देश है जिसने सर्कस में किसी भी जानवर का उपयोग करने पर प्रतिबंध लगाया है।
हंसाने का काम करते हैं जोकर
सर्कस में सबसे ज्यादा तालियां बजती हैं जोकरों के लिए। खासकर बच्चे इनका इंतजार करते रहते हैं कि ये कब मंच पर आएंगे। रंग-बिरंगे चेहरे, नकली नाक व बाल लगाकर सबको हंसाने वाले जोकर दो प्रोग्राम के बीच के टाइम में पिलर का काम करते हैं। इस समय में वो सबको खूब हंसाते हैं। कई लोगों की नकल करके जोक सुनाके वे ऐसा करते हैं। कई बार तो इनके भी अलग कार्यक्रम होते हैं। आमतौर पर जोकर वे बनते हैं जो शारीरिक विकास में पिछड़ जाते हैं और कद कम रह जाता है। बच्चों जैसे दिखने वाले ये जोकर कई बार साठ-साठ साल की उम्र तक के होते हैं। कई जोकर आम इनसान जितने भी होते हैं पर तालियां तो छोटे कद वाले जोकर ही बटोर ले जाते हैं। इनका काम भी काफी मेहनतभरा होता है।
सर्कस पर किताबें भी
यूं तो सर्कस पर बहुत किताबें लिखी गई हैं इनमें एनिड ब्लाइटन की सर्कस सीरीज पर लिखी तीन किताबें खासी चर्चित रही है। सर्कस में ट्रेनर रहे दामू धोत्रे की आत्मकथा वाली पुस्तक भी बहुत अच्छी है।
इस तरह आया सर्कस
सर्कस शब्द सर्कल शब्द से बना है जिसका अर्थ है घेरा। दुनिया का सबसे पुराना सर्कस प्राचीन रोम में था। आज से करीब 2500 वर्ष पहले बने इस सर्कस का नाम था मैक्सिमम। बताते हैं कि भारत का पहला अपना सर्कस था द ग्रेट इंडियन सर्कस। इसका पहला शो मुंबई में 20 मार्च 1880 को हुआ था। अमेरिका के द रिंगलिंग ब्रदर्स एंड बार्नम एंड बैले सर्कस को दुनिया का सबसे बड़ा सर्कस माना जाता है।