
IVF Market : बेरोजगार युवा पैसों के लिए बेच रहे एग-स्पर्म
ARUN KUMAR
IVF Market : कोरोना के बाद पूरी दुनिया में इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन In Vitro Fertilization (IVF Market) बाजार तेजी से बढ़ा है लेकिन भारत आईवीएफ की वैश्विक राजधानी बनता दिख रहा है। कोरोना संक्रमण, घटती प्रजनन दर, बेरोजगारी, देर से शादी, खराब खानपान और अनियमित दिनचर्या और नशेबाजी इसका बड़ा कारण है। सस्ते स्पर्म (शुक्राणु), एग (अंडाणु) और ट्रीटमेंट के चलते हर साल 25 हजार से अधिक विदेशी भारत में आईवीएफ कराते हैं। पहले से ही देश में 3 करोड़ जोड़े बांझपन से पीडि़त हैं। एम्स दिल्ली के हालिया अध्ययन के मुताबिक कोरोना के बाद 10 से 15 फीसदी विवाहितों की प्राइवेट लाइफ प्रभावित हुई है। बच्चे पैदा करने में अक्षम महिला-पुरुषों को घर-परिवार और समाज की यातनाएं इतना परेशान करती हैं कि वे संतान-प्राप्ति के लिए गुपचुप कुछ भी करने को तैयार जाते हैं। आईवीएफ सेंटर इसका नाजायज फायदा उठाते हैं। गुजरात, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, झारखंड उत्तर प्रदेश और राजस्थान में कई ऐसे मामले आए जहां इलाज के बहाने महिलाओं के अंडाणु निकालकर अन्य दंपतियोंं को बेच दिए गए।
आईवीएफ सेंटर और स्पर्म-एग बैंक के इस कारोबार मेें पैसे कमाने या शौक पूरे करने के चक्कर में अविवाहित युवक-युवतियां अपने स्पर्म या एग कई-कई बार बेच रहे हैं। कानूनी पचड़ों से बचने के लिए वे नाम बदल कर अलग-अलग सेंटरों या स्पर्म-एग बैंकों को सैंपल दे रहे हैं। पुणे की चर्चित गायनकोलॉजिस्ट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनके पास कई ऐसी लड़कियां आईं जो नाक या होठों की सर्जरी या फिर दोस्तों के साथ टूर पर जाने के लिए एग बेचकर रुपए कमाना चाहती थीं। देश के कई मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के छात्र, मॉडलिंग स्टूडेंट, शतरंज या अन्य खेलों से जुड़े खिलाड़ी तक अपने स्पर्म बेचकर शौक पूरे कर रहे हैं।
साख के लिए कुछ भी कर रहे आईवीएफ सेंटर
आईवीएफ की सफलता दर अभी भी 35 फीसदी से कम है। मां बनाने का लोभ देकर जेनेटिक डिफेक्ट के बहाने आईवीएफ सेंटर बेहिचक जेंडर टेस्ट कर लड़का पाने की चाह रखने वाले दंपतियों से तीन गुना रुपए वसूलते हैं। यह सब गैरकानूनी है मगर धड़ल्ले से हो रहा है। आईवीएफ सेंटर अपनी साख के लिए दंपतियों को सौ फीसदी भरोसा देकर कभी सहमति तो कभी असहमति से अन्य पुरुषों के स्पर्म के उपयोग से भी नहीं चूकते हैं।
स्पर्म-अंडाणु की क्वालिटी तय करती है कीमत
इंडियन मेडिकल रिसर्च सेंटर (आईसीएमआर) की गाइडलाइन के मुताबिक 21 से 55 वर्ष का पुरुष स्पर्म तो 23 से 35 वर्ष की एक बच्चे की मां अंडाणु दान कर सकती है। स्पर्म या अंडाणु की क्वालिटी जितनी बेहतर होती है उतनी ही कीमत में वे बिकते हैं। डोनर की लंबाई, रंग, शैक्षिक योग्यता, आंखों का रंग, चेहरा गोल या लंबा, लाइलाज बीमारियोंं से मुक्त और विशेष ब्लड गु्रप वाले प्रोफाइल की कीमत 20 से 40 हजार तक होती है।
छह लाख में से ढाई लाख महिलाओं का ही ट्रीटमेंट
दुनियाभर में अब तक आईवीएफ तकनीक से 90 लाख बच्चों का जन्म हो चुका है। भारत में हर साल 1800 आईवीएफ क्लीनिकों में करीब 2.5 लाख महिलाओं का ट्रीटमेंट (प्रजनन चक्र) हो पाता जबकि जरूरत 6 लाख महिलाओं को होती है। देश के शीर्ष 8 शहरों- मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद और पुणे में हर साल कुल आईवीएफ के 55 फीसदी मामलों का ट्रीटमेंट होता है।
घटी प्रजनन दर तो बढ़ा आईवीएफ बाजार
देश में घटती प्रजनन दर आईवीएफ बाजार के फलने फूलने की बड़ी वजह है। सुविधा और जरूरत के अनुसार माता-पिता बनने के फैसले और बच्चा गोद लेने की जटिल प्रक्रियाओं से बचने के लिए भी लोग आईवीएफ, एग या स्पर्म डोनेशन का सहारा ले रहे हैं। पढ़े-लिखे संपन्न दंपती स्पर्म या एग लेने को बुरा भी नहीं मानते हैं।
- डॉ. अरुणा कालरा, सीनियर ऑब्स्टट्रिशन, सी. के. बिरला हॉस्पिटल, गुरुग्राम
Published on:
17 Aug 2022 09:38 pm
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