
Kachchatheevu : भारत का ‘अंश’ अब बन चुका है मछुआरों के लिए ‘दंश’
Kachchatheevu
तमिलनाडु के मछुआरों के श्रीलंका के साथ अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा पर कच्चतीवू (टापू) के निकट मछली नहीं पकड़ पाने और इस जतन में हमलों का शिकार होने की पीड़ा के बीच इस टापू के जिक्र ने नई हलचल पैदा की है जबकि इसके अधिग्रहण का विवाद करीब पचास साल पुराना है। 1974 में श्रीलंका को भेंट यह कच्चतीवू ’वरुण के बेटों’ को शूल की तरह चुभता जा रहा है। कच्चतीवू को वापस हासिल करने की मांग इन दशकों में चिट्ठी-पत्रों, आरोप-प्रत्यारोप, आपसी संवादों और सुप्रीम कोर्ट में वाद तक का सफर तय कर चुकी है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोकसभा में कच्चतीवू का जिक्र कर तत्कालीन भारत सरकार को जिम्मेदार ठहराया कि उसकी वजह से यह टापू भारत के हाथ से चला गया। जमीनी तौर पर वहां के हालात में कुछ बदलाव नहीं हुए हैं। भारतीय मछुआरे टापू का उपयोग तो कर पा रहे हैं लेकिन उसके आस-पास मछली पकड़ने से महरूम हैं। राजनीतिक दलों की बात करें तो यह उनका प्रमुख मुद्दा है जिस पर वे बयानी करते रहते हैं।
कच्चतीवू निर्जन टापू
285 एकड़ का यह निर्जन टापू जिसकी लम्बाई बमुश्किल 1.6 किमी और चौड़ाई 300 मीटर होगी भारत और श्रीलंका के बीच पाक जलडमरूमध्य में स्थित है। रामेश्वरम के उत्तर-पूर्व में स्थित टापू की भारतीय तट से दूरी लगभग 33 किमी है, जबकि श्रीलंका तट जाफना 62 किमी है। कच्चतीवू पर 20वीं सदी का कैथोलिक सेंट एंथोनी चर्च है जिसके सालाना समारोह में भारतीय और श्रीलंकाई मछुआरे हिस्सा लेते हैं।
श्रीलंका से सीमा विवाद
शुरुआती समय में जाफना का अंग रहा कच्चतीवू चौदहवीं सदी में ही अस्तित्व में आया है। 17वीं शताब्दी में इस पर रामनाथ जमींदारी का नियंत्रण था। फिर ब्रिटिशकाल में यह मद्रास प्रेसिडेंसी का अंग रहा। मछली पकडऩे को लेकर विवाद उपजने के बाद 1921 से श्रीलंका और भारत ने अपना दावा ठोकना शुरू किया। सीमांकन में तब इसे श्रीलंका का दिखाया गया लेकिन ब्रिटिश प्रतिनिधिमंडल ने इसका विरोध कर इसे रामनाथ जमींदारी का हिस्सा बताया। पड़ोसी मुल्क के साथ बेहतर रिश्तेदारी के उद्देश्य के साथ भारत सरकार ने 1974 में भारत-श्रीलंका समुद्री समझौते के तहत यह टापू भेंट कर दिया।
राजनीतिक और राजनयिक मसला
कच्चतीवू के वार्षिक उत्सव की रिपोर्टिंग कर चुके वरिष्ठ पत्रकार ने राजस्थान पत्रिका से वार्ता में कहा कि यह अब राजनीतिक और राजनयिक मसला है। वस्तुत: देखा जाए तो टापू से अधिक बड़ा मसला मछुआरों के शिकारे का है। वे मछली पकड़ते समय कदाचित सीमा पार कर जाते हैं। राज्य और केंद्र दोनों सरकारें नर्सरी बढ़ाने और समय-समय पर समुद्र में मछलियों को छोडऩे जैसी पहल कर रही हैं, लेकिन यह काफी नहीं है। दोनों सरकारों को मछुआरों को गहरे पानी में मछली पकडऩे के लिए प्रोत्साहित करना होगा। इसके लिए विशेष रूप से निर्मित नावों और लगभग डेढ़ करोड़ रुपए के उपकरणों की आवश्यकता होगी। सब्सिडी और ब्याज मुक्त ऋण देकर मछुआरों की मदद होनी चाहिए।
राजनीतिक घटनाक्रम
भारत सरकार के इस फैसले का तमिलनाडु भर में खूब विरोध हुआ और उसके बाद से कच्चतीवू अधिग्रहण एक नारा बनकर रह गया है। तमिलनाडु का दावा है कि कच्चतीवू के मसले पर राज्य विधानसभा से सहमति नहीं ली गई और इसे वापस हासिल किया जाना चाहिए।
1991 में तमिलनाडु विधानसभा ने कच्चतीवू अधिग्रहण का प्रस्ताव पेश किया
2008 में अन्नाद्रमुक महासचिव जे. जयललिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 1974 के समझौते को असंवैधानिक कहा। उनका वाद था कि बिना संविधान में संशोधन के यह अधिकार हस्तांतरण हुआ है।
2011 में तमिलनाडु विधानसभा में फिर प्रस्ताव पारित
2012 में सुप्रीम कोर्ट से फिर अपील की मामले का त्वरित निपटारा किया जाए, मामला अभी तक लम्बित
टापू पर कुछ घंटे रुक पाते हैं
एक जमाना था जब टापू के निकट मछुआरों पर गोलीबारी होती थी। अब फायरिंग के मामले नहीं के बराबर है। रामेश्वरम से लेकर नागपट्टिनम तक के मछुआरे कच्चतीवू पर अधिकतम दो से तीन घंटे तक रुक पाते हैं। ज्यादा देर रुकने पर श्रीलंकाई नौसेना के हमले का खतरा रहता है। वे तट पर मौजूद मछुआरों के साथ मारपीट के अलावा जाले काट देते हैं। सालाना चर्च उत्सव में करीब तीन हजार मछुआरे शामिल होते हैं। जहां तक कच्चतीवू को वापस हासिल करने की बात है मेरे खयाल में यह केवल राजनीति ही है।
- एंथोनी (72) मछुआरा, रामेश्वरम
Published on:
06 Sept 2023 03:28 pm
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