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अब नहीं दिखेगा सदी पुराना कुरवन-कुरथी लोक नृत्य

- सरकार ने हाईकोर्ट के निर्देश के बाद लगाया प्रतिबंध

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अब नहीं दिखेगा सदी पुराना कुरवन-कुरथी लोक नृत्य

अब नहीं दिखेगा सदी पुराना कुरवन-कुरथी लोक नृत्य

चेन्नई. दक्षिणी जिलों में सालों से लोकप्रिय रहा कुरवन-कुरथी लोक नृत्य पर रोक लगा दी गई है। सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के निर्णय की पालना में दस मार्च को सरकारी आदेश जारी किया।


पर्यटन, संस्कृति और धार्मिक बंदोबस्ती विभाग ने कहा कि मद्रास हाईकोर्ट के ११ जनवरी को दिए गए फैसले की पृष्ठभूमि में सरकार ने यह कदम उठाया है।
सरकार की मानें तो कुरवन, मलय कुरवन और कुरवर संघ की संयुक्त कार्य समिति ने भी सरकार को ज्ञापन दिया था कि कुरवन कुरथी आट्टम (नृत्य) को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।


आदिवासी समुदाय कुरवर
तमिलनाडु में कुरवर एक जाति है जो आदिवासी हैं और पहाड़ी इलाकों में बसी है। इनका उद्भव कुरिंजी पर्वतीय क्षेत्र माना जाता है। मनोरंजन के नाम पर इस समुदाय के लोक कलाकार मंदिरों और अन्य समारोहों में लोक नृत्य करते हैं। इस नृत्य में पारंपरिक गीतों के अलावा वेशभूषा, हाव-भाव और वाद्य यंत्रों की बड़ी भूमिका रहती है। लेकिन समय के साथ इनका 'प्रदर्शनÓ नैतिक सीमाओं को लांघने लगा और अश्लीलता की परत इस पर चढऩे लगी। तमिलनाडु के हर जिले में इसका अलग-अलग स्वरूप है। ये कलाकार ज्यादातर तिरुचि, कडलूर, दिंडीगुल, पलनी, सेलम, रामनाथपुरम, तिरुनेलवेली और मदुरै में पाए जाते हैं।


हाईकोर्ट में सुनवाई
जनवरी महीने में एक मंदिर के समारोह में कुरवन कुरती नृत्य को अनुमति देने की मांग की गई थी जिसे निरस्त करते हुए हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि इस नृत्य पर पूरी रोक लगे। हाईकोर्ट को जातिसूचक शब्द पर भी आपत्ति थी। उस निर्णय की तामील में सरकार ने लोक कलाकार कल्याण बोर्ड की सूची जिसमें १०० लोक नृत्य हैं, से कुरवन कुरथी आट्टम को हटा दिया है।


रोजी खतरे में
वस्तुत: कुरवन-कुरथी नृत्य करगाट्टम (सिर पर कलश रख नृत्य करना) का ही एक रूप है। लेकिन बदलते परिवेश की वजह से इसमें कम परिधानों के साथ नाच और अभद्र हाव-भाव का समावेश होता चला गया। सादगी से भी इस नृत्य को पेश करने वाले कलाकार हैं, लेकिन पूरी तरह इस पर रोक लगा दी जाने से अब उनकी आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।
रूबन दास, लोक कलाकार, तिरुवल्लूर