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भगवान शिव दर्शन के लिए छोड़ गए पादुका और वृक्ष

नागपट्टिनम जिले के कुत्तालम में भगवान शिव का श्री उत्तेवदीश्वरर मंदिर स्थित है। इस मंदिर का दूसरा नाम श्री अरुम्बान वानमुलै नायकी उत्तवेदीश्वरर मंदिर

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Paduka and tree left for Lord Shiva philosophy

Paduka and tree left for Lord Shiva philosophy

चेन्नई।नागपट्टिनम जिले के कुत्तालम में भगवान शिव का श्री उत्तेवदीश्वरर मंदिर स्थित है। इस मंदिर का दूसरा नाम श्री अरुम्बान वानमुलै नायकी उत्तवेदीश्वरर मंदिर भी है। शैव संत तिरुज्ञानसंबंदर ने अपने भक्ति काव्य में यहां भगवान शिव की आराधना की है। कावेरी नदी तट के दक्षिणी छोर पर यह ३७वां शिवालय है। इस मंदिर में भगवान शिव की चरण पादुका के दर्शन अत्यंत शुभ माने जाते हैं।

पौराणिक कथा

एक समय की बात है जब एक शैव संत रुद्रासन मोक्ष के लिए काशी जा रहा था। भगवान शिव उसे यह अहसास कराना चाहते थे कि यह क्षेत्र भी काशी के समकक्ष है। उन्होंने अपने गण गुंडोदर से कहा कि वह उसे सर्प भेष में जाकर रोके। जब गुंडोदर ने ऐसा किया तो रुद्रासन ने गरुड़ मंत्र जपना शुरू कर दिया। इस मंत्र के प्रभाव से सर्परूपधारी गुंडोदर बेहोश हो गया। तभी भगवान शिव सपेरे के रूप में वहां प्रकट हुए। रुद्रासन को यह भांपते देर नहीं लगे कि सपेरा कौन है? वह शिव के चरणों में गिर गया। भगवान ने कहा कि उसकी मोक्ष की इच्छा इसी स्थल पर पूरी हो जाएगी।

अन्य जातक कथा के अनुसार भगवान उत्तवेदीश्वरर का यहां विवाह हुआ। इसी तरह अग्नि देव ने अपनी ज्वाला को नियंत्रित करने में सफलता पाई। जनश्रुति के अनुसार भगवान शिव के प्रेम में रत मां पार्वती उनसे विवाह करना चाहती थी। उन्होंने तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे घर आकर माता-पिता से हाथ मांगने को कहा। भगवान ने ऐसा ही किया और माता-पिता की सहमति हासिल कर पार्वती से विवाह रचाया।

इतिहास और संरचना

मंदिर का स्वरूप और संरचना देखकर स्पष्ट है कि यह काफी पुराना शिवालय है। मंदिर का क्षेत्रफल काफी बड़ा है। पांच मंजिला राजगोपुरम है जिससे मंदिर की चारदीवारी जुड़ी है। उत्तवेदीश्वरर शिवलिंग स्वयंभू है। देवी पार्वती अरुम्बान वानमुलै नायकी के रूप में प्रतिष्ठित है। मंदिर का आदि वृक्ष उत्ताल वृक्ष है जिसकी अपनी महिमा है। करीब दो हजार साल पुराने इस मंदिर के जलकुण्ड पद्म, सुंदर और कावेरी तीर्थ हैं। कुत्तालम का पुरातन नाम तिरुतुरुति हुआ करता था। मंदिर के शिल्प और उकृत कलाकृतियों में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा यहां शिव की पूजा करते दर्शित हैं। साथ ही गुरु भगवान मां सरस्वती की वीणा धारण किए हैं। मंदिर में भगवान शिव की पादुका प्रतिष्ठित है। परिसर में दोनों पत्नियों सहित भगवान मुरुगन की भी सन्निधि है।

विशेष आकर्षण

महाशिवरात्रि इस मंदिर का मुख्य उत्सव है। स्वयंभू शिवलिंग के अलावा परिसर में उत्ताल वृक्ष और शिव की चरण पादुका का अत्यंत महत्व है। कहते हैं कि भगवान शिव यहां पार्वती से विवाह के लिए आए थे। मंदिर में प्रवेश करने से पहले उन्होंने अपनी पादुका बाहर छोड़ी और कैलाश पर्वत से उनकी छतरी बनकर आए उत्ताल वृक्ष को भी यहीं स्थापित कर दिया। मंदिर में इन दोनों के दर्शन होते हैं। देवी पार्वती, देवी काली, कश्यप, गौतम, मार्कण्डेय, आंगिरस, वशिष्ठ, पुलस्ति व अगस्त्य सप्तऋषियों ने यहां शिव पूजा की। विवाह में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए इस मंदिर में प्रार्थना की जाती है।