15 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

‘आम की टोकरी’ कविता को लेकर विरोध, छोकरी शब्द पर आपत्ति

कई शिक्षाविदों को छोकरी शब्द पर आपत्ति, कहा इसकी जगह बिटिया या बालिका जैसी शब्दावली हो, कविता में बाल मजदूरी का प्रदर्शन हो रहा- पहली कक्षा की किताब में 'आम की टोकरी' कविता को लेकर विरोध

2 min read
Google source verification
poem

poem

चेन्नई. ''छह साल की छोकरी, भरकर लाई टोकरी। टोकरी में आम हैं, नहीं बताती दाम है। दिखा-दिखाकर टोकरी, हमें बुलाती छोकरी। हम को देती आम है, नहीं बुलाती नाम है। नाम नहीं अब पूछना,हमें आम है चूसना।'' यह कविता राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा तैयार की गई किताब रिमझिम 1 का हिस्सा है। दरअसल पहली कक्षा की हिंदी की किताब में ''आम की टोकरी'' शीर्षक से यह कविता छपी है। जिसमें छोकरी शब्द को लेकर सबसे अधिक आपत्ति जताई गई है। इसे लेकर अब विवाद बढ़ गया है और कई लोगों ने इस कविता को पाठ्यक्रम से हटाने की मांग की है।
एनसीईआरटी की सफाई
इसके बाद राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआइटी) ने इसे लेकर अपनी सफाई भी दी जिसमें कहा कि एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में दी गई कविताओं के संदर्भ में स्थानीय भाषाओं की शब्दावली को बच्चों तक पहुंचाने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ये कविताएं शामिल की गई हैं ताकि सीखना रुचिपूर्ण हो सके। एनसीईआरटी ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। इसी पाठ्यचर्या की रूपरेखा के आधार पर भविष्य में पाठ्यपुस्तकों का निर्माण किया जाएगा।
कविता के शब्दों पर एतराज
छत्तीसगढ़ कैडर के 2009 बैच के आईएएस अधिकारी अवनीश शरन ने भी इस कविता को अपने ट्विटर अकाउंट पर साझा करते हुए लिखा था ये किस सड़क छाप कवि की रचना है?? कृपया इस पाठ को पाठ्यपुस्तक से बाहर करें। इस कविता के छोकरी शब्द को लेकर सोशल मीडिया पर पिछले काफी दिनों से विवाद खड़ा हुआ था। हिंदी भाषा के कई जानकार और सोशल मीडिया यूजर्स इस कविता को पाठ्यपुस्तक से हटाने की मांग कर रहे है। छोकरी शब्द को कई लोग आवारा बोल चाल की भाषा बता रहे है और यह भी तर्क दे रहे थे है पहली कक्षा के छात्र अगर इस शब्द को पढ़ेंगे तो उनके मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसकी जगह बालिका या बिटिया जैसी शब्दावली काम में ली जा सकती थी। यह भी कहा जा रहा था कि इस कविता में छह साल की बच्ची से आम बिकवा कर बाल मजदूरी को प्रदर्शित किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग इस कविता के शब्दों पर ऐतराज जता रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इस कविता का समर्थन कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस कविता में कुछ भी गलत नहीं है।
..................................


प्रकाशक व प्रणाली दोनों ही दोषी
आम की टोकरी जैसी कविता का पाठ्यपुस्तक में प्रकाशित करना अपने आप में अपराध है। प्रकाशक व प्रणाली दोनों ही दण्डनीय है।
- रतन डालमिया, कवि व गीतकार, चेन्नई।
..............................


कविता पाठ्यक्रम के योग्य नहीं
कविता स्तरहीन है। बच्चों को पाठ्यक्रम में रखने लायक नहीं है।
- डॉ. सुधा त्रिवेदी, कवयित्री व सहायक प्रोफेसर, चेन्नई।
.............. .............