
Political journey of Karunanidhi and MGR
चेन्नई।करुणानिधि और एमजीआर तमिलनाडु की सियासत के अहम स्तंभ रहे हैं। ये दोनों इस दुनिया में अब नहीं हैं, लेकिन कभी दोनों की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। करुणानिधि के शब्द और एमजीआर के एक्शन ने एक दूसरे को मंजिल तक पहुंचाने में मदद की।
करुणानिधि स्क्रिप्ट लिखते थे, जिसने एमजीआर को स्टार बनाया। वहीं ऐक्टर एमजीआर लोगों को डीएमके की विचारधारा के मैसेज देते थे, जिससे करुणानिधि की राजनीतिक विरासत और मजबूत होती गई। करीब 30 साल पहले करुणानिधि और एमजीआर गहरे दोस्त हुआ करते थे।
करुणानिधि अपनी राजनीति के तो एमजीआर अपने अभिनय क्षेत्र का संघर्ष एक दूसरे से साझा करते थे। यह 1950 की बात है, जब करुणानिधि की स्क्रिप्ट ‘मंतिरी कुमारी’ ने एमजीआर को बड़ी सफलता दी। युवा लेखक करुणानिधि को अपनी योग्यता से नाम, मिश्रित विचारधारा और व्यावसायिक सफलता मिली और एमजीआर एक बड़े एक्टर हो गए। करुणानिधि के शब्दों और विचारों से प्रेरित होकर एमजीआर 1953 में कांग्रेस छोडक़र डीएमके में आ गए। एमजीआर ने तमिलनाडु के सिनेमा-प्रेमी मतदाताओं को डीएमके के समर्थन में ला दिया। करुणानिधि को एक करिश्माई और प्रभावशाली दोस्त मिल गया। हालांकि एमजीआर करुणानिधि से सात साल बड़े थे, लेकिन देखने में करुणानिधि बड़े लगते थे।
1969 में मुख्यमंत्री बनने के 18 महीने बाद अन्नादुरै का निधन हो गया। हर किसी को उम्मीद थी कि नेदुनचेझियन ही मुख्यमंत्री बनेंगे। एमजीआर की मदद से करुणानिधि ने बहुत ही चतुराई से अपना रास्ता बनाया और मुख्यमंत्री बने। वे अगला चुनाव जीते और फिर जीतते ही चले गए।
कई वर्षों बाद विधानसभा चुनाव के दौरान करुणानिधि ने एमजीआर को याद करते हुए कहा उनको मुख्यमंत्री बनाने में एमजीआर की भूमिका अहम थी। उन्होंने कहा कि एमजीआर के साथ उनके मतभेद होंगे लेकिन जब अन्नादुरै के उत्तराधिकारी की नियुक्ति का सवाल आया, तो एमजीआर उनके लिए अभियान में सबसे आगे थे।
करुणानिधि ने एमजीआर के लिए कृतज्ञता व्यक्त की लेकिन फिर वापस एमजीआर की लोगों को आकर्षित करने की क्षमता करुणानिधि के लिए चिंता का विषय हो गई। यह वह समय था जब करुणानिधि की गणना गलत साबित हुई।
करुणानिधि ने एमजीआर का मुकाबला करने के लिए अपने बेटे एम. के. मुत्तु को कालीवुड में लॉन्च किया और एमजीआर को पार्टी से किनारे करने की कोशिश की। एक साल बाद एमजीआर डीएमके से अलग हो गए और उन्होंने अपनी अलग पार्टी एआईएडीएमके बनाई। एमजीआर के साथ उनके प्रशंसकों का बड़ा समूह डीएमके से अलग हो गया। 1977 में एमजीआर सत्ता में आ गए और करुणानिधि को अपने पूर्व मित्र एमजीआर के निधन (1987) तक विपक्ष में बैठना पड़ा।
करुणानिधि और एमजीआर की दोस्ती और दुश्मनी से प्रेरित होकर निर्देशक मणिरत्नम ने 1997 में फिल्म ‘इरुवर’ बनाई। लेखक आर. कानन ने दोनों के बीच दरार का कारण बताते हुए लिखा उस वक्त केंद्र सरकार चाहती थी कि 1971 में प्रभावशाली चुनावी प्रदर्शन करने वाली डीएमके को तोड़ दिया जाए। एमजीआर उनके हाथों का खिलौना बन गए। दोनों के व्यक्तिगत मतभेद और विवाद सार्वजनिक थे, लेकिन विधानसभा में उनके संबंध आदर्श रहे।
कन्नन कहते हैं कि दोनों एक दूसरे का पारस्परिक सम्मान करते थे और सौहार्दपूर्ण तरीके से मिलते थे। हालांकि अपने अंतिम कार्यकाल में एमजीआर ने डीएमके का विरोध किया जब उन्होंने विधान परिषद को समाप्त कर दिया और कई डीएमके विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया था।
2009 में ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक ने कहा था कि ऐसा लगता है एमजीआर के साथ दोस्ती टूटने का पछतावा करुणानिधि को है। एमजीआर के पहले टर्म में उन्होंने दोनों को मिलाने का प्रयास भी किया था। वे चेपॉक गेस्ट हाउस में करुणानिधि से मिले और लगभग 30 वर्षों के दोस्तों को फिर से मिलाने का फैसला किया। उसी शाम एक पब्लिक मीटिंग में एमजीआर ने कहा कि ऐसा कभी नहीं होगा। 2008 में विधानसभा में भाषण के दौरान करुणानिधि ने अपने दोस्त के साथ नजदीकियों को याद करते हुए कहा, मरने से पहले मेरी प्रबल इच्छा है कि एआईएडीएमके सहित सभी पार्टियां एक हो जाएं। उनकी यह इच्छा अब अधूरी ही रहेगी।
करुणानिधि की जिंदगी के दिलचस्प किस्से
करुणानिधि की आत्मकथा और उनको करीब से जानने वालों से उनके बारे में बहुत दिलचस्प जानकारियां मिली है। करुणानिधि ने महज 14 साल की उम्र में जस्टिस पार्टी ज्वाइन की थी। इसके बाद तमिल राजनीति के शिखर पर पहुंचने तक उन्होंने पीछे मुडक़र नहीं देखा।
ऐसे चुना चुनाव चिन्ह
जब अपनी उम्र के 80वें दशक में करुणानिधि ने ध्यान लगाना शुरू किया, तो उन्होंने अपने ध्यान केंद्र के लिए सूरज को चुना। उनको योग सिखाने वाले श्रीधरन ने बताया कि डीएमके प्रमुख का अपनी पार्टी के चुनाव चिह्न को ध्यान के लिए चुनना काफी दिलचस्प था। योग शिक्षक ने कृष्णमचार्या योग मंदिरम के फाउंडर टीकेवी देशिकाचर के साथ करुणानिधि को योग सिखाया।
मंत्री को पांच बजे फोन
करुणानिधि सुबह पांच बजे जागते थे, इसके बाद वे पार्टी से जुड़ा अखबार पढ़ते थे और कॉफी पीते थे। तमिलनाडु की पहली महिला मंत्रियों में से एक रही सुब्बुलक्ष्मी जगदीशन ने बताया कि एक बार करुणानिधि ने उनको सुबह पांच बजे फोन किया था। उन्होंने पूछा, ‘क्या तुमने भ्रूण हत्या पर अखबार में छपा लेख पढ़ा?’ सुब्बुलक्ष्मी ने बताया कि उन्हें डीएमके प्रमुख के सामने यह बात स्वीकार करनी पड़ी कि वह सोकर भी नहीं उठी थी।
Published on:
20 Sept 2018 09:08 pm
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