मानवता सिखाने का सशक्त माध्यम है शहीदी उत्सव का लंगर
चेन्नई.
तमिलनाडु में आयोजित इस शहीदी पर्व सहित अन्य प्रमुख आयोजनों पर सिख समुदाय का मानना है कि अपनी विरासत और परंपरा से जोड़े रखने के लिए आयोजन जरूरी हो जाते हैं।
आयोजनों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्री गुरुनानक सतसंग सभा के महासचिव सुरजीत सिंह मदान ने कहा कि पंजाब से दूर होने के बावजूद वहां के लोगों को अपनी विरासत और परंपरा से जोड़े रखने के लिए हर साल शहीदी पर्व का आयोजन किया जाता है। पंजाब की शहीदी परंपरा और विरासत को याद रखने के लिए इस तरह के आयोजन बहुत जरूरी हैं। महानगर में सिख समुदाय की ओर से प्रतिवर्ष बड़े धूमधाम के साथ 23 मई को अर्जुन देव सिंह का शहीदी पर्व मनाया जाता है। इस दौरान प्रार्थना और लंगर के साथ छबील भी लगाई गई।
समानता और प्रेम-भाव सिखाते हैं इस तरह के आयोजन
इस साल भी इस अवसर पर भजन-कीर्तन के साथ छबील और लंगर लगाया गया। सिख धर्म में लंगर का महत्व बताते हुए कहा कि लंगर के दौरान सभी लोग एक साथ जमीन पर बैठकर खाना खाते हैं। इस दौरान जाति, धर्म, समुदाय आदि हर तरह का भेदभाव भुलाकर सभी का समान भाव से स्वागत-सत्कार किया जाता है। सही मायने में देखा जाए तो लंगर लोगों को समानता और प्रेम भाव सिखलाता है। वास्तव में लंगर मनुष्य में मानवता विकसित करने का एक सशक्त माध्यम है।
कष्ट में राहत देने का प्रतीक है छबील
शहीदी पर्व पर छबील पिलाए जाने की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए एक सिख महिला ने बताया कि मुगल शासक जहांगीर ने जब सिखगुरु अर्जुनदेव सिंह को यातना देकर मारने की जिम्मेदारी लाहौर के मुर्तजा खान को दी तो उसने इसे चंदू को सौंप दिया। चंदू के हाथों अर्जुनदेव सिंह को यातना देना खुद उसकी बहू को रास नहीं आया। उसने उनकी हालत देखकर उन्हें पिलाने के लिए मीठा शरबत ले आई लेकिन गुरुजी ने शरबत पीने से मना कर दिया। इसके बाद बहुत मिन्नत करने पर गुरु अर्जुनदेव सिंह ने कहा कि इस मुख से तो मैं तेरा शरबत नहीं पीऊंगा लेकिन एक समय ऐसा जरूर आएगा जब तुम्हारे नाम का ये शरबत हजारों लोग पिलाएंगे और लाखों लोग इसे पीने वाले होंगे। उन्होंने बताया कि गर्मी के मौसम में ठंडा छबील पीना सेहत के लिए भी लाभदायक होता है।