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रीडर्स फेस्ट : राज राजचोलन और हजार साल पुराना तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर

- डॉ. दिलीप धींगचोल वंश के लोकप्रिय राजाओं में से एक थे राज राजचोलनचार संस्कृतियों की झलक दिखती है बृहदीश्वर मंदिर में

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रीडर्स फेस्ट : राज राजचोलन और हजार साल पुराना तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर

रीडर्स फेस्ट : राज राजचोलन और हजार साल पुराना तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर

चेन्नई. चोल राजवंश में सम्राट राज राजचोलन ने वर्ष 985 से 1014 तक लगभग 29 वर्षों तक शासन किया। राजचोलन एक कलाप्रेमी और शिव उपासक राजा थे। शिवभक्त होने के बावजूद वे उदार धार्मिक सहिष्णु थे। उनका विश्वास था कि जो वंदनीय है, उसके आगे झुकने से हमारा गौरव घटता नहीं, अपितु बढ़ता है। उनके शासनकाल में जैनों और बौद्धों ने तमिल साहित्य की श्रीवृद्धि में योगदान किया। भगवान शिव को समर्पित बृहदीश्वर मंदिर में तमिल, आंध्र, श्रीलंका तथा मराठा संस्कृतियों की झलक दिखाई देती है। इस सम्बन्ध में डॉ. कन्हैयालाल मुंशी ने ठीक ही लिखा कि जब महमूद उत्तर भारत को रौंद कर लूट रहा था, तब भारतीय इतिहास का एक प्रमुख राजा राज राजचोलन एक शक्तिसंपन्न साम्राज्य की आधारशिला रख रहा था। अनेक प्रदेशों को जीतने के बाद उन्होंने कुशल प्रशासन से जनता को सम्पन्न समृद्ध किया था। कला और साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। इसलिए उन्होंने तंजावुर में बृहदीश्वर मंदिर की स्थापना की, जो भारतीय शिल्पकला की एक अनुपम कृति है। मृत्य के समय वे समस्त दक्षिण भारत के राजा थे। मालद्वीप, श्रीलंका तथा आंध्रप्रदेश के कुछ क्षेत्रों पर भी उनका शासन था।

नायाब कलाओं का खजाना

‘देवालय चक्रवर्ती’ के नाम से प्रसिद्ध बृहदीश्वर मंदिर हस्तकला, शिल्पकला, चित्रकला और स्थापत्यकला की अमर कृति है। ग्यारहवीं सदी में ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर में सम्मिलित है। इस पूर्वाभिमुख मंदिर का विशाल गोपुरम एक ही चट्टान से बना है। गोपुरम की छाया धरती पर नहीं पड़ती है। यह मंदिर मनुष्य के श्रम और कौशल का जीता जागता प्रमाण है। जो कार्य मशीन नहीं कर पाती है, वह मानव के हाथों ने कर दिखाया। मंदिर में विमान कलश, अर्धमंडप, महामंडप, मुखमंडप और नंदीमंडप हैं। एक लम्बी चौड़ी शिला पर नंदी की विशाल भव्य मूर्ति है। नंदी की यह मूर्ति 12 फीट ऊंची, 20 फीट लंबी और 9 फीट चौड़ी है। भारत में नंदी की यह दूसरी सबसे बड़ी मूर्ति मानी जाती है। बृहदीश्वर मंदिर के कारण तंजावुर का सुयश पूरे विश्व में फैला हुआ है।


गुम्बद की परछाई का रहस्य
हिंदी-तमिल विद्वान टीएसके कण्णन बताते हैं इस मंदिर के गोपुर की ऊंचाई 216 फीट है, जो तमिल अक्षरों की गिनती 216 के बराबर है। शिवमूर्ति की ऊंचाई 12 फीट है तो तमिल स्वर अक्षरों की गिनती भी 12 है। शिवपीठ की ऊंचाई 18 फीट है तो तमिल के व्यंजनों की गिनती भी 18 हैं। इस प्रकार कला के साथ भाषा और साहित्य का समन्वय किया गया है। मंदिर के गुम्बद की छाया का जमीन पर नहीं दिखाई देना आज भी विज्ञान के अनसुलझे रहस्यों में से एक है। दिसंबर 2021 में रामनाथपुरम के पास चोल युगीन सिक्के मिले थे। पुराविद् वी. राजगुरु के अनुसार ये सिक्के राज राजचोलन की श्रीलंका पर पहली विजय के उपलक्ष्य में जारी किये गये थे। इन सिक्कों के एक पहलू पर तीन पंक्तियों में ‘‘श्री राज राज’’ देवनागरी लिपि में लिखा हुआ है। भाषा और लिपि के बारे में राजचोलन की उदारता के फलस्वरूप सुदूर दक्षिण और श्रीलंका में एक हजार वर्ष पूर्व देवनागरी लिपि भी प्रचलन में थी।

पहली नौसेना बनाने वाले शासक

राजचोलन ने अपने शासनकाल में विभिन्न कलाओं के अलावा साहित्य, संगीत, नाटक, सेना, प्रशासन, प्रजाहित आदि अनेक क्षेत्रों में योगदान किया। उन्होंने कवियों, विद्वानों और कला-साधकों को बहुत प्रोत्साहित और पोषित किया। कण्णन के अनुसार राज राजचोलन की विशेष देन यह रही कि भारत देश के महाराजाओं में सबसे पहले जलसेना इसी राजा ने बनाई। विश्व का पहला चुनाव इसी राजा ने करवाया। ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर राजचोलन को आधुनिक प्रजातंत्र का उन्नायक कहा जा सकता है।