
Tamilnadu: हजार घरों की बस्ती में स्कूल एक भी नहीं!,Tamilnadu: हजार घरों की बस्ती में स्कूल एक भी नहीं!
हजार घरों की बस्ती में स्कूल एक भी नहीं!
चेन्नई. देश के चार महानगरों में से एक चेन्नई ऐसा शहर है जो हर तरीके सुरक्षित ही नहीं बल्कि सुविधायुक्त भी है। अन्य महानगरों की तरह इस महानगर की जनसंख्या करोड़ से ऊपर नहीं बल्कि केवल अस्सी लाख ही है। करीब अस्सी किलोमीटर में पसरा यह शहर हिन्द महासागर के किनारे बसा है। वैसे तो समुद्र किनारे बसा होने के कारण इस शहर में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए लेकिन वास्तविकता यह है कि देश में सबसे ज्यादा पानी का संकट इसी शहर में रहता है। यहां की अधिकांश कॉलोनियां वाटर टैंकरों पर निर्भर हैं।
दुर्घटनाओं का ग्राफ सर्वाधिक
महानगर चेन्नई में सफाई एवं बिजली का संकट कतई नहीं है। यहां चौड़ी सड़कें हैं जिससे आवागमन कम ही बाधित होता है। परेशानी यह है कि चौड़ी सड़कें होने के बावजूद देश में दुर्घटनाओं का ग्राफ अन्य महानगरों के मुकाबले यहां सर्वाधिक है।
कच्ची बस्तियों की संख्या ज्यादा
इस साफ-सुथरे शहर में यदि कोई दाग है तो वह है यहां बसी कच्ची बस्तियां, जिनकी संख्या करीब १९९९ है। इनमें से सरकार जिस बस्ती के निवासियों को अन्यत्र जमीन देकर बसाती है उसके अगले साल ही एक नई कच्ची बस्ती और बस जाती है जिससे इस संख्या अभी तक सरकार भी कम नहीं कर पाई है। इस महानगर में ऐसी अनेक बस्तियां हैं जो करीब ४०-५० साल पहले से बसी हैं और उनको जमीन अभी तक भी अलॉट नहीं की गई है।
संतोष नगर तरस रही सुविधाओं को
महानगर में कच्ची बस्तियों में से एक है संतोष नगर। ईवीआर पेरियार सालै के सामने राजा अण्णामलै ब्रिज के पश्चिमी हिस्से में बसी यह बस्ती करीब ४५ साल पुरानी है और इसमें करीब १००० घर हैं। इनमें से २५० परिवारों को तो हाउसिंग बोर्ड द्वारा स्लम बोर्ड अलॉटमेंट योजना के तहत यथास्थान जमीन अलॉट कर दी गई लेकिन बाकी अभी तक अलॉटमेंट के लिए तरस रहे हैं। इनको जमीन नहीं मिलने का मूल कारण यह है कि जिस जमीन पर ये बसे हैं वह जमीन मंदिर की है। परेशानी यह है कि सरकार इनको जहां जमीन देती है वहां ये जाना नहीं चाहते और मंदिर प्रशासन इनको यह जमीन देने को तैयार नहीं है।
बस्तीवासियों के पास सभी तरह के प्रूफ
हालांकि इन लोगों के पास पैन कार्ड, आधार कार्ड, राशन कार्ड, मतदान पहचान पत्र ही नहीं स्मार्ट कार्ड भी है। इस कॉलोनी में हर गली में एक सरकारी नल लगा है जिसमें हर तीसरे दिन सवेरे ५ से 7 बजे तक आता है जिससे लोगों में पानी की मारामारी रहती है। इसके अलावा सरकार द्वारा हर तीसरे दिन वाटर टैंकर (निशुल्क) उपलब्ध कराया जाता है जो बस्ती के कोने पर लगे दो टैंकों में डालकर चले जाते हैं। उससे हर परिवार को केवल तीन घड़ा पानी दिया जाता है। ऐसे में यहां सबसे बड़ा संकट पानी का ही है।
सफाई की पुख्ता व्यवस्था नहीं
बस्ती में सफाई कर्मी कभी आता है कभी नहीं, इसलिए चारों ओर कचरा पसरा ही रहता है। इतना ही नहीं बस्ती के लोगों को बिजली भी अधिक दर पर दी जाती है। बच्चों की स्कूल व खेल मैदान की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकारी प्राइमरी स्कूल बस्ती के बाहर वीरासामी पिल्लै स्ट्रीट में है जबकि मिडिल स्कूल एगमोर में है। बच्चों को खेलने के लिए नेहरु पार्क स्टेडियम या राधाकृष्णन स्टेडियम में जाना पड़ता है। राशन की दुकान भी दास प्रकाश के पास है।
अलॉटमेंटका वादा कर चले जाते हैं नेता
जमीन अलॉटमेंट के बारे में बस्तीवासियों का कहना है कि प्रशासन के पास कई बार मांग कर चुके हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। हर पांच साल में जब चुनाव होते हैं तो हर पार्टी का नेता आकर जमीन अलॉट कराने की वादा करता है, चुनाव खत्म होते ही पांच साल तक नजर ही नहीं आते। इसी तरह पूरे पैंतालीस साल निकल गए।
Published on:
14 Sept 2019 05:39 pm
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