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Patrika Readers Fest: ईस्ट इंडिया कंपनी की संप्रभुता नहीं स्वीकार की, लड़ा पॉलीगर का पहला युद्ध

क्रांतिकारी वीरपांडि कट्टाबोम्मन : मातृभूमि के सम्मान, राष्ट्र गौरव और गरिमा के लिए दी अपनी जान

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ईस्ट इंडिया कंपनी की संप्रभुता नहीं स्वीकार की, लड़ा पॉलीगर का पहला युद्ध

ईस्ट इंडिया कंपनी की संप्रभुता नहीं स्वीकार की, लड़ा पॉलीगर का पहला युद्ध

चेन्नई.

स्वतंत्रता सेनानी वीरपांडि कट्टाबोम्मन ने मातृभूमि के सम्मान, गौरव तथा गरिमा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी लेकिन उन्होंने अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके। वे 18वीं शताब्दी में पलायककर और तमिलनाडु में पंचलंकुरिची के सरदार थे। उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की संप्रभुता को स्वीकार करने के बजाय उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। इस युद्ध को पॉलीगर का पहला युद्ध कहा जाता है।

3 जनवरी 1760 को जगवीरा कट्टाबोम्मन और अरुमुगतम्माल के पुत्र के रूप में जन्मे वीरपांडिय कट्टाबोम्मन तमिलनाडु के तुत्तुकुड़ी जिले के पंचलंकुरिची गांव में बोम्मु तथा आदि कट्टाबोम्मन वंश के थे। कट्टाबोम्मन पर मुकदमा चलाए जाने के बाद उनको मौत की सजा सुना दी गई और 16 अक्टूबर 1799 ईस्वी को कायाथर में फांसी दे दी गई। उनके पिता पालयकारर (सामंती उपाधि) थे, तथा 30 वर्ष के होने के बाद 47वें पालयकारर के रूप में यह उपाधि वीरपांडिय को दे दी गई।

पुदुकोट्टै के राजा की सूचना पर पकड़े गए

तिरुक्कालंबूर के जंगलों में वीरपांडिय के छिपे होने की सूचना मिलने पर अंग्रेज़ों ने पुदुकोट्टै के राजा विजय रघुनाथ तोंडैम्मन को धमकी दी कि वे वीरपांडिय को पकडक़र अंग्रेज़ों के हवाले कर दे या परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें। इस दबाव के सामने झुकते हुए राजा ने वीरपांडिय को पकडऩे के लिए अपने सैनिकों को भेजा और 1 अक्तूबर 1799 को कायातर से वीरपांडिय को गिरफ्तार कर लिया गया। करीब 15 दिन चली जांच और हास्यास्पद सुनवाई के बाद वीरपांडिय को सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई।

अचानक हुए हमले को किया विफल

अंग्रेजों की योजना में एक अवांछनीय तत्व के रूप में उभर रहे कट्टाबोम्मन के विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेज अलग- अलग प्रकार के षड्यंत्र करने लगे। फिर भी, वे अपनी योजनाओं में तब तक सफल नहीं हो सके जब तक उन्होंने 1799 में मेजर जे बैनरमैन के नेतृत्व में पंचलंकुरिची पर अचानक ही हमला करने का निर्णय लिया। पूरा गांव एक मंदिर उत्सव के लिए उस दिन तिरुचेंदूर में जमा था जब अंग्रेज़ों ने वीरपांडिय पर चुपके से हमला करने की कोशिश की। लेकिन उन्हें हमले की इस योजना के बारे में पहले से ही पता चल चुका था और उन्होंने इसकी तैयारी कर रखी थी। वीरपांडिय ने अपने साथियों के साथ किले को छोड़ पुदुकोट्टै के निकट तिरुक्कालंबूर के जंगलों में शरण ले ली।

यह वह समय था जब तिरुनेलवेली में अपना केंद्र स्थापित करने के साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी भारत के दक्षिणी क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति मजबूत कर रही थी। इस क्षेत्र को मजबूती से अपने नियंत्रण में करने के लिए अंग्रेजों ने सुनियोजित कदम उठाए। उन्होंने आरकॉट नवाब को भारी मात्रा में धनराशि उधार दे दी और उसकी चुकौती नवाब के अधीन आने वाले पालयकाररों से वसूले जाने वाले करों और उगाहे गए धन के माध्यम से करने की मांग की। चूंकि नवाब भारी कर्ज में डूबे हुए थे, इसलिए कर संग्रहण के नाम पर हो रहे अंग्रेज़ों के अत्याचार को देखते रहे।

वीरपांडि के अलावा अन्य सभी पालयकाररों ने कंपनी के आगे घुटने टेक दिए। अत्यंत कूटनीतिक तरीके से अंग्रेजों ने सभी क्षेत्रीय राजनेताओं के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध बनाए रखने का प्रयास जारी रखा और उन राजनेताओं ने वीरपांडि को अंग्रेजों से हाथ मिला लेने और फिर शांति से रहने की सलाह दी। हालांकि युवा नेता कट्टाबोम्मन ने झुकने से इनकार कर दिया और अंग्रेजों के हर प्रकार के दबाव का डटकर सामना किया।