
Yoganandiswarar Temple
चेन्नई।तंजावुर जिले के कुंभकोणम के निकट तिरुवीसनल्लूर में अतिप्राचीन भगवान शंकर का योगनंदीश्वरर मंदिर है। मूल शिवलिंग का अन्य नाम शिवयोगी नाथर है। इस मंदिर को चारों युग का प्रतीक माना जाता है। यह उन चुनिन्दा मंदिरों में से एक है जहां सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, पालनकर्ता महाविष्णु और संहारक भगवान शिव के दर्शन होते हैं। शैव संतों के थेवारम में मंदिर का उल्लेख है।
तिरुज्ञानसंबंदर ने यहां शिवस्तुति की है। यह मंदिर कावेरी के उत्तरी छोर पर बना ४३वां शिवालय है। मंदिर का प्रशासन तमिलनाडु हिन्दू धर्म व देवस्थान विभाग के अधीन है।
पौराणिक कथा
जातक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने विष्णु शर्मा नामक विप्र के घर जन्म लिया। उनके साथ छह योगी भी जन्मे। सभी ने भगवान शिव की उपासना की। शिवरात्रि पर भगवान शिव ने उनको दर्शन दिए और सभी का सात रोशनी के रूप में आत्मसात कर लिया। इस वजह से भगवान शिवयोगी नाथर कहलाए। एक अन्य कथा के अनुसार एक बार पापी मनुष्य मंदिर आया जिसकी अंतिम घड़ी निकट थी। उसने मंदिर में भगवान शिव को पुकारा। भगवान ने अपने वाहन नंदी से कहा कि देखो कौन पुकार रहा है। जैसे ही नंदी ने पलट कर देखा उस व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो गए। इसलिए इस मंदिर में नंदी का पीछे की ओर हल्का सा घुमा हुआ है। यमराज जब उस व्यक्ति के प्राण हरने आए तो नंदी ने उनको रोक लिया।
दोनों में युद्ध हुआ और नंदी ने यम को पछाड़ दिया तथा यम को ध्वज स्तम्भ से बाहर तक खदेड़ दिया इसलिए मंदिर में नंदी की सन्निधि ध्वज स्तम्भ के बाहर है। मान्यता है कि ३०० वर्ष पहले सिद्ध पुरुष अय्यावल श्राद्ध कर रहे थे। श्राद्ध के वक्त पितृदान से पहले दान करना वर्जित है लेकिन उन्होंने एक भूखे व्यक्ति को उस भोजन कराया। गांववाले इससे कुपित हो गए और उनको पाप का भागी बताकर गंगा में नहाने को कहा। सिद्ध पुरुष ने शिवाराधना कर यहीं गंगा प्रकट कराई और उसमें डुबकी लगाई।
इतिहास और संरचना
यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। इस मंदिर के स्वयंभू शिवलिंग को चारों युग का साक्ष्य माना गया है, जो पूर्व दिशा की तरफ मुख किए हैं। इससे इसकी पुरातनता का अंदाजा लगाया जा सकता है। तमिल महिने चित्तिरै की प्रथम तीन तिथियां शिवलिंग का अभिवादन करती हैं। मंदिर में देवी पार्वती सौंदर्यनायकी रूप में प्रतिष्ठित है। भगवान गणेश और कार्तिकेयन अपनी दोनों पत्नियों के साथ भक्तों को दर्शन देते हैं।
मंदिर में लक्ष्मीनारायण, महाविष्णु, प्रजापिता ब्रह्मा और नवग्रह की मूर्तियां भी हैं। तीनों देवताओं के एक साथ दर्शन को अत्यंत मंगलकारी बताया गया है। मंदिर का परकोटा बहुत विशाल है जिसमें अनुरक्षित छोटा सा बगीचा और अन्य सन्निधियां हैं। मंदिर का मूल वृक्ष बिल्व है और इससे आठ जलकुण्ड जुड़े हैं जिनमें जटायु तीर्थ प्रमुख है। कुंभकोणम महामगम मेले की वजह से मंदिर का हाल ही जीर्णोद्धार हुआ है इसलिए इसकी वास्तुकला पूरी तरह जीवंत है। मंदिर का राजगोपुरम पांच मंजिला है जिसके भीतर गर्भगृह का गोपुरम है। राजगोपुरम के भीतर ही सभी सन्निधियां हैं।
विशेष आकर्षण
मंदिर की दक्षिणी दीवार पर सात सौ वर्ष पुरानी सूर्य घड़ी है जो सूर्य की किरणों के आधार पर समय दिखाती है। इस घड़ी में एक पट्टी लगी है जो अद्र्धगोलाकर समय **** निर्देशों के बीचों-बीच है। सूर्य की किरणों से बनने वाली छाया के अनुरूप इसमें समय देखा जा सकता है। भगवान शिव के यहां चारों युग के अनुरूप नाम हैं। सतयुग में वे पुरातनेश्वरर, त्रेता युग मेें बिल्वनारायणेश्वरर, द्वापर युग में योगनंदीश्वरर और कलयुग में शिवयोगीनाथर हैं।
कहा गया है कि रामायणकाल में जटायु के पंख इस क्षेत्र में गिरे थे। इसलिए यहां का जटायु कुंड अत्यंत महत्वपूर्ण है। मंदिर में चतुर्काल भैरव की विशेष पूजा होती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। चारों काल के प्रतीके के रूप में भैरव मूर्तियों के साथ ही शनि भगवान की बाल मूर्ति है। चारों भैरव मूर्तियों का नामकरण ज्ञानकाल भैरवर, स्वर्णाकर्षण भैरवर, उन्मत्त भैरवर और उत्तर भैरवर के रूप में हुआ हैं।
Published on:
04 Sept 2017 09:41 pm
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