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अधिग्रहण का दंश और मुआवजे का इंतजार- सागर-कबरई फोरलेन की राह में रोड़ा बने 35 करोड़, छतरपुर के 56 गांवों के किसानों ने काम रोककर दी सामूहिक कोर्ट जाने की चेतावनी

203 करोड़ रुपए का मुआवजा वितरित किया जाना था, जिसमें से 168 करोड़ रुपए का भुगतान तो कर दिया गया है, लेकिन शेष 35 करोड़ रुपए अब भी फाइलों में दबे हुए हैं।

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रुका हुआ निर्माण कार्य

बुंदेलखंड की जीवनरेखा माने जाने वाले सागर-कबरई फोरलेन प्रोजेक्ट की रफ्तार पर प्रशासनिक लेटलतीफी और मुआवजे के विवाद ने ब्रेक लगा दिया है। 232 किलोमीटर लंबे इस महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का एक बड़ा हिस्सा अब विवादों की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। छतरपुर जिले के 56 गांवों के किसान अपनी जमीनों का हक न मिलने से इस कदर आक्रोशित हैं कि उन्होंने न केवल निर्माण कार्य रुकवा दिया है, बल्कि अब सामूहिक रूप से उच्च न्यायालय की शरण में जाने का मन बना लिया है।

35 करोड़ के फेर में फंसा भविष्य

प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार जिले में कुल 203 करोड़ रुपए का मुआवजा वितरित किया जाना था, जिसमें से 168 करोड़ रुपए का भुगतान तो कर दिया गया है, लेकिन शेष 35 करोड़ रुपए अब भी फाइलों में दबे हुए हैं। यही 35 करोड़ रुपए की बकाया राशि आज 107 किलोमीटर लंबी निर्माणाधीन सडक़ के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई है। किसान स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि जब तक उनके बैंक खातों में मुआवजे की पूरी राशि नहीं आती, वे अपनी जमीन की एक इंच मिट्टी भी कंपनी को छूने नहीं देंगे?

ग्राउंड जीरो पर कड़ा विरोध- कहीं दीवारें बनी ढाल, कहीं खेत बने मैदान

विरोध का आलम यह है कि महोबा रोड पर अतरा सरकार के पास ग्रामीणों ने एक वेयरहाउस की दीवार और कमरे पर स्पष्ट चेतावनी लिख दी है कि मुआवजा मिलने तक इसे न तोड़ा जाए। इसके चलते वहां काम पूरी तरह ठप पड़ा है।

नत्थू रैकवार (डडारी निवासी)- इनकी 242 आरए जमीन अधिग्रहित हुई, लेकिन मुआवजा किश्तों के फेर में ऐसा उलझा कि आज तक पूरा पैसा हाथ नहीं आया।

वृंदावन कुशवाहा (निवारी निवासी)- इनकी 3 एकड़ जमीन ली गई, लेकिन मुआवजे की राशि तीन हिस्सेदारों में से सिर्फ एक को ही मिली, बाकी दो भाई आज भी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।

ठेकेदार कंपनियों की मुश्किलें बढ़ीं

प्रोजेक्ट के अलग-अलग चरणों में काम कर रही कंपनियां—वेलजी रत्ना सोराठिया इंफ्रास्ट्रक्चर (फेज-3) और एमकेसी इंफ्रास्ट्रक्चर गुजरात (फेज-4) अब विवादित स्थलों को छोडकऱ अन्य जगहों पर काम करने को मजबूर हैं। फेज-4 का काम पहले ही देरी से शुरू हुआ था, और अब मुआवजे के इस बड़े गतिरोध के कारण 2026 की निर्धारित समय सीमा में प्रोजेक्ट का पूरा होना नामुमकिन सा लग रहा है।

प्रशासन का तर्क- जमीन विवाद हैं देरी की वजह

दूसरी ओर, जिला प्रशासन का दावा है कि प्रक्रिया रुकी नहीं है। एसडीएम प्रशांत अग्रवाल के अनुसार, कुछ मामलों में जमीन विवाद और आपसी बंटवारे की समस्याओं के कारण भुगतान में देरी हो रही है। प्रशासन का कहना है कि वे एनएचएआई के अधिकारियों के साथ मिलकर इन तकनीकी बाधाओं को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि निर्माण कार्य पुन: सुचारू हो सके।

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