
बुन्देलखंड के मांझी बने बाबा कृष्णानन्द
राठ/हमीरपुर। पेयजल संकट से जूझ रहे बुंदेलखण्ड में जल संरक्षण की तमाम योजनाऐं चल रहीं हैं। वाबजूद इसके योजनाओं की हकीकत कहीं नजर नहीं आ रही है। लेकिन सुमेरपुर विकास खंड के पचखुराखुर्द गांव में एक सन्यासी बाबा ने तीन साल तक लगातार अकेले मशक्कत कर दस बीघे तालाब को खोद डाला। जिसमें अब लबालब पानी भरा है। जिसका उपयोग स्थानीय ग्रामीण और मवेशी कर रहे हैं। जबकि तीन साल पहले तक तालाब में सिल्ट भर जाने से उसकी जल भरण क्षमता कम हो गई थी। जिससे बरसात के चार महिने में पानी मिलता था, इसके बाद गांव के बच्चे वहां क्रिकेट खेलते थे। इसी गांव के रहने वाले किशनपाल सिंह, स्वामी परमानंद के सानिध्य में आए और उन्होंने सन्यास ले लिया। अब उनका नाम बाबा कृष्णानंद हो गया है। वह 2014 में गांव लौटे तो पीने के पानी की दिक्कत से इतना प्रभावित हुए कि गांव के लोगों से तालाब की खुदाई के लिए सहयोग मांगा तो लोगों ने हंसकर टाल दिया। लेकिन बाबा कृष्णानंद की लगन एक फावड़ा, एक तसला के सहारे तीन साल अथक प्रयास कर तालाब की खुदाई कर उसकी मिट्टी भीट में डालकर उसकी भरण क्षमता बढ़ा दी। अब यह तालाब जिसमें पूरे साल पानी रहता है। 200 साल पहले बने इस तालाब को कलारनदायी के तालाब के नाम से जाना जाता है। गांव की कलार परिवार की दम्पत्ति तीर्थयात्रा से लौटकर आए तो उनकी इच्छा हुई कि गांव में तालाब बनाया जाए, इसके लिए उन्होंने दस बीघा जमीन खरीद कर तालाब और रामजानकी का मंदिर बनवाया था। समय गुजरा और तालाब सूखता चला गया। जिले के सुमेरपुर विकासखंड से 20 किमी दूर पचखुराखुर्द गांव में बाबा ने तीन साल में करीब 7 हजार ट्राली मिट्टी तालाब से खोदकर उसके किनारे जमा कर दी। गौरतलब है कि बाबा ने बुलंदशहर जिले के खुर्जा तहसील के जहांगीरपुर में परमानंद शिक्षण संस्थान की नींव रखी थी, जो आज महाविद्यालय का रूप ले चुका है। वहां प्रबंधक दिनेश अग्रवाल हैं। इसके बाद बाबा अपनी जन्मभूमि में वापस लौट आए। चंदेलकालीन तालाब की तर्ज पर बने इस तालाब के किनारों में पक्के घाट बने हैं। जिसका उपयोग गांव के लोग कर रहे हैं। बुंदेलखण्ड के दशरथ मांझी ने नि:स्वार्थ भाव से इस तालाब के मूल रूप को वापस ला दिया है। आज गांव ही नहीं बुंदेलखण्ड में बाबा कृष्णानंद के इस अथक प्रयास की चर्चा है।
Published on:
24 Jun 2019 05:00 am
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