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बारिश में बुंदेली जायके से सजने लगी घरों की रसोई

दाल और बेसन के चीला, गुलगुला सहित बुंदेली जायका लेने आज भी पीछे नहीं लोग

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Bundeli kitchens of the houses started to rain in the rain

Bundeli kitchens of the houses started to rain in the rain

छतरपुर। बुंदेलखंड की लोक संस्कृति और परंपराएं पहले से ही समृद्ध रही हैं। उसी से जुड़ा यहां का खान-पान सेहत और स्वाद के हिसाब से भरपूर है। मौसम केअनुसार यहां पर लोग अपने जायके का स्वाद बदलते आए हैं। हर महीने के लिए यहां पर खास तरह के व्यंजन बनते हैं। घरों की रसोई में मौसम अनुकूल पकवान ही बनते आए हैं। बारिश का मौसम और सावन का महीना शुरू होती ही बुंदेलखंड के घरों में चीला, तिल के लड्डू और गुलगुला जैसे पकवान बनने लगे हैं। इसके अलावा खुरमां, गुजिया, ठडूंला, रसखीर, इंदरसे जैसे दर्जनों पकवान त्योहारों के मौके पर बनाए जाते हैं। सावन के आते ही लोगो के घरों में अभी से इन पकवानों के जायके तैयार होने लगे हैं। सावन महीने में सबसे अधिक त्योहार होते हैं। हर त्यौहार का अपना खास पकवान भी है। इन पकवानों को जायके के साथ सेहत से भी जोड़ा गया है। बुंदेली व्यंजनों के स्वाद और उसके सेहत के गुणों को यहां के लोक साहित्य में भी पर्याप्त स्थान दिया गया है।
लोक साहित्य में समाहित है पकवानों का बखान :
बुंदेली साहित्यकार डॉ. बहादुर सिंह परमार बताते हैं कि लोक में अलग-अलग मौसम में तरह-तरह के पकवान बनाने का प्रचलन बहुत अधिक रहता है जिनका मौसम के हिसाब से स्वाद भी रसीला रहता है। गर्मियों में सतुआ मिलता था जो मौसम के हिसाब से लोगों को स्वस्थ रखने कारगर साबित होते थे। बुन्देली साहित्य में मौसम के अलग अलग दृश्यों में विविध व्यंजनों का बेहतर ढंग से चित्रण भी मिलता है।
"लपटा, लटा, गुलगुला, चीला, अदरैनूं बसकारै ।
तिलकूचा, रसखीर, इंदरसे, मुरका खा जड़कारै ।।
जेठमास में डुबरी, सतुवा, भूंजा मयरी खा रए ।
खुरमा, बतियाँ, पुवा, ठडुला, दुरलभ हो गए ।।
गलगल-पच्चे खूब उड़त ते रै गए बिसरे नांव में ।
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।"2
आधुनिक खान-पान ने बदला लोगों का स्वाद :
डॉ. परमार बताते हैं कि बुंदेलखंड में व्यंजन हमेशा देशी खाद्य पदार्थो से बनते थे और दावत का बहुत ही सुंदर स्वरूप विद्यमान था। वर्तमान समय मे लोक व्यवहार में अमूल चूल परिवर्तन हो गया है अब दावत में शारीरिक दुर्बलताओं को उत्पन्न करने वाली वस्तुओं को भोजन में ग्रहण करते है दारू का प्रचलन आज शिक्षित, अशिक्षित समाज मे जोर शोर से होता है। जबकि पूर्व में मक्का के आटे का प्रयोग होता था तो कहीं पर गुजियां बनाने में गेहूँ के आटे का प्रयोग किया जाता था। लेकिन अब जहरीले कोल्ड ड्रिंक का प्रयोग होता है पहले नीबू पानी के साथ पुदीना एवं चीनी का घोल लोगों के हृदय को तरोताजा कर देता था। आज इसे साधारण परिवारों की पहचान तक सीमित कर दिया है। भोजन के बाद दूध का प्रयोग निश्चित रहता था लेकिन वर्तमान में दूध लोगों के पास चाय के लिए ही नसीब होता है। पहले के लोगों को भोजन में स्वाद के साथ सेहत की चिंता थी। यह बात बुंदेली मुक्तक में भी देखी जा सकती है।
"मका जुनई के पुवा बनत ते और कनक की गुजियां ।
सरबत संगै तुरवा खा रए रोटी बरीं पपइयाँ ।।
दूद डरो घोटुवा खात जब फर्र-फुर्र फुर्रआवे
सामे बैठत ललचत ते वे मनई मन गुर्रावे ।।
मधुप महेरो गुड़ला गुड़का स्वाद हतो फुर्राव में
कितै हिरा गए बे नौनें दिन भइया अपने गांव में ।।

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