
सीएमएचओ ऑफिस छतरपुर
छतरपुर. स्वास्थ्य विभाग के वर्ष 2022 के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश के 12 जिलों में क्यूलेक्स मच्छर के कारण होने वाली लिम्फैटिक फाइलेरिया बीमारी एवं इसी मच्छर से होने वाली हाइड्रोशील बीमारी का सबसे ज्यादा खतरा सामने आया है। इन 12 जिलों में से 6 जिले बुन्देलखण्ड के हैं। जहां इन बीमारियों के सबसे ज्यादा रोगी सामने आए हैं। छतरपुर में फाइलेरिया बीमारी के 681, टीकमगढ़ में 232, दमोह में 147, दतिया में 187, सागर में 30, पन्ना में 660 मामले सामने आए हैं। छतरपुर जिले में सर्वाधिक फाइलेरिया के मरीज मौजूद हैं। इसलिए अब छतरपुर जिले में एक विशेष अभियान आज से शुरु किया जा रहा है। रोकथाम के लिए मलेरिया विभाग द्वारा नाइट ब्लड सर्वे 3 अक्टूबर से शुरू होगा, जो 23 अक्टूबर तक चलेगा। इस दौरान 20 टीमों को 75 स्लाइड बनाने का टॉरगेट दिया गया है। जिला स्तर पर कंट्रोल रूम भी बनाया गया है। सर्वे रात 8 से शुरू होकर 12.30 बजे तक चलेगा। सर्वे के लिए जिले के 14 गांवों का चयन किया किया गया है। प्रत्येक साइट में 300 रक्त पट्टी का संग्रहण भी किया जाना है। इस संबंध में सीएमएचओ डॉ. लखन तिवारी ने निर्देश जारी कर दिए हैं।
2022 में छतरपुर जिले में घटे 251 मरीज
जिले में फाइलेरिया के मरीजों की संख्या पिछले एक साल में घटी है। जिले में वर्ष 2021 में सक्रिय 932 मरीजों में से 681 केस ही वर्ष 2022 में एक्टिव रहे। एक साल में 251 मरीज कम हुए हैं। लेकिन अभी भी मच्छर जनित इस बीमारी के प्रति लोगों में जागरुकता की कमी है। जिसके चलते पूरे जिले में ग्रामीण इलाके में फाइलेरिया के मरीज मिल रहे हैं। हालांकि जिले में केवल सटई क्षेत्र ही एक ऐसा इलाका है, जहां फाइलेरिया का एक भी मरीज नहीं है। जबकि जिले के छोटे-छोटे गांवों में मरीज मिल रहे हैं।
6 साल बाद उभरते हैं लक्षण
सीएमएचओ कार्यालय में पदस्थ डॉ. सोनल ने बताया कि आमतौर पर रूके हुए एवं गंदे पानी में क्यूलेक्स मच्छर के लार्वा पनपते हैं। यह मच्छर जब किसी व्यक्ति को काटता है तो शुरूआती 6 से 8 साल तक फाइलेरिया और हाइड्रोशील बीमारियों का पता ही नहीं लग पाता। लगभग 6 साल बाद इन बीमारियों के लक्षण उभरते हैं लेकिन तब तक यह बीमारी लाइलाज हो जाती है। दवाइयों के जरिए इस बीमारी को नियंत्रित रखा जा सकता है लेकिन जड़ से नष्ट नहीं किया जा सकता। इस बीमारी के कारण पैरों में सूजन, गठान जैसी समस्याएं हो जाती हैं जिससे पैर हाथी पांव के रूप में बदल जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस बीमारी को हाथी पांव के नाम से भी जाना जाता है।
लिम्फैटिक फाइलेरिया के लक्षण
लिम्फैटिक फाइलेरियासिस आमतौर पर एलिफेंटियासिस के रूप में जाना जाता है। एक परजीवी पतले कृमि (फाइलेरियल नेमाटोड) के कारण होता है जो मच्छरों के काटने से मनुष्यों को संक्रमित करता है। कीड़े शरीर में गुणा करते हैं और लिम्फैटिक तंत्र के भीतर रुकावटें पैदा करते हैं। इसके परिणामस्वरूप शरीर के विभिन्न ऊतकों में द्रव संग्रह होता है। यह गंभीर दर्द के साथ बड़े पैमाने पर सूजन की ओर जाता है और इन स्थिर तरल पदार्थों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले अन्य संक्रमणों से बार-बार बुखार का कारण बनता है। लिम्फेडेमा (सूजन) संक्रमित होने के कई सालों बाद होने लगती है। यह रोग हाइड्रोसील और घरघराहट जैसी अन्य स्थितियों के अलावा प्रभावित वयस्कों में विचित्र विकृति और विकलांगता का कारण बनता है। एक हाथी के समान होता है, इसलिए इसका नाम एलिफेंटियासिस है।
इनका कहना है
फाइलेरिया की पहचान व रोकथाम के लिए 20 टीमें गठित की गई है। 23 अक्टूबर तक अभियान चलाकर बीमारी की पहचान की जाएगी। टीमें रात में सर्वे सैंपल कलेक्ट करेंगी।
डॉ. लखन तिवारी, सीएमएचओ
फैक्ट फाइल
सागर संभाग में फाइलेरिया की स्थिति
छतरपुर 681
दमोह 147
पन्ना 660
सागर 30
टीकमगढ़ 232
फैक्ट फाइल
छतरपुर जिले में मरीजों की स्थिति
नौगांव 13
ईशानगर 114
छतरपुर शहर 87
बड़ामलहरा 47
बकस्वाहा 49
राजनगर 67
लवकुशनगर 81
गौरिहार 156
Published on:
02 Oct 2023 11:15 am
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