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छतरपुर में रसोई गैस का संकट: कागजों में स्टॉक फुल, लेकिन शहर की सड़कों पर 8000 परिवारों की लंबी वेटिंग

होम डिलीवरी न मिलने के कारण उपभोक्ता सुबह से ही गैस गोदामों और एजेंसियों के बाहर लंबी कतारों में लगने को मजबूर हैं। मंगलवार को खासतौर पर पन्ना रोड स्थित गोदाम पर उपभोक्ताओं की लंबी भीड़ देखी गई।

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रसोई गैस के लिए उपभोक्ताओं की कतार

जिले में रसोई गैस की किल्लत ने आम जनता के चूल्हों की रफ्तार धीमी कर दी है। एक तरफ जिला प्रशासन जिले की 39 एजेंसियों के पास 7087 सिलेंडरों का पर्याप्त स्टॉक होने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि केवल छतरपुर शहर की चार प्रमुख एजेंसियों में ही 8000 से अधिक बुकिंग पेंडेंसी (वेटिंग) पहुंच गई है। हालत यह है कि होम डिलीवरी न मिलने के कारण उपभोक्ता सुबह से ही गैस गोदामों और एजेंसियों के बाहर लंबी कतारों में लगने को मजबूर हैं। मंगलवार को खासतौर पर पन्ना रोड स्थित गोदाम पर उपभोक्ताओं की लंबी भीड़ देखी गई। ईद के चलते पहले सिलेंडर की गाड़ी नहीं आई और फिर सोमवार को स्वरुप गैस एजेंसी के अवकाश के चलते मंगलवार को उपभोक्ता गोदाम पर उमड़ पड़े।

शहर का गणित: मांग ज्यादा, आपूर्ति कम

प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार जिले में प्रतिदिन औसतन 4500 सिलेंडरों का वितरण हो रहा है। लेकिन शहर की स्थिति चिंताजनक है।

स्वरूप गैस एजेंसी (महल रोड): यहां सबसे बड़ा संकट है, जहां 3600 बुकिंग पेंडिंग हैं।
छतरपुर गैस एजेंसी (जवाहर रोड): यहां 1750 उपभोक्ता अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।
मयंक इंडेन (नौगांव रोड) व कृपालु गैस (देरी रोड): यहां क्रमशः 1350 और 1300 की पेंडेंसी है।


प्रशासन का आश्वासन: जल्द खत्म होगी कतारें


आपूर्ति व्यवस्था पर जिला प्रशासन का कहना है कि गुना बॉटलिंग प्लांट से अब गाड़ियां नियमित रूप से छतरपुर पहुंच रही हैं। अधिकारियों का दावा है कि आपूर्ति अब अपडेटेड मोड में है और जिन उपभोक्ताओं का डीएसी नंबर जारी हो चुका है, उन्हें जल्द ही घर पर डिलीवरी दी जाएगी। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि पैनिक न हों और अनावश्यक भंडारण से बचें।

कालाबाजारी पर कार्रवाई

व्यवस्था सुधारने के नाम पर पिछले 15 दिनों में प्रशासन ने कार्रवाइयां भी की, लेकिन हालात अभी भी सामान्य नहीं हो सके हैं।
विश्वनाथ कॉलोनी (वार्ड 3): 25 अवैध सिलेंडर जब्त कर इसी एक्ट में मामला दर्ज।

ग्राम बिलहरी: 13 घरेलू सिलेंडर पकड़े गए।

चन्द्रनगर व बमीठा: 13 मार्च को 25 सिलेंडर जब्त कर संबंधित एजेंसी के विरुद्ध कार्रवाई की गई थी।

एजेंसी वार वर्तमान स्टॉक की स्थिति

आईओसीएल (27 एजेंसियां): 5750 सिलेंडर

बीपीसीएल (7 एजेंसियां): 1185 सिलेंडर

एचपीसीएल (5 एजेंसियां): 152 सिलेंडर

कुल योग: 39 एजेंसियों के पास 7087 सिलेंडर का स्टॉक

दावे और हकीकत में अंतर से ही सड़क पर उपभोक्ताओं की कतार

प्रशासन भले ही स्टॉक होने की बात कह रहा है, लेकिन करीब 8000 की पेंडेंसी यह बता रही है कि वितरण व्यवस्था में कहीं न कहीं बड़ा मिसमैनेजमेंट है। जब तक शहर की ये लाइनें कम नहीं होतीं, तब तक सब सामान्य होने का दावा खोखला नजर आता है।

चूल्हे ठंडे, होटलों पर ताले लटकने की नौबत

अब कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर का संकट गहरा गया है। इस किल्लत ने शहर के जायके और व्यापार दोनों पर ब्रेक लगा दिया है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि जिले के कई नामी होटल और रेस्टोरेंट बंद होने की कगार पर हैं। कई प्रतिष्ठानों में तो ताले तक लटक चुके हैं, जिससे व्यापारियों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

वैश्विक युद्ध का स्थानीय असर: सप्लाई चेन पूरी तरह ठप

इस संकट की जड़ें सात समंदर पार पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष से जुड़ी हैं। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने के कारण कमर्शियल सिलेंडरों की आवक पूरी तरह बंद हो गई है। गैस एजेंसियों पर सुबह से ही उपभोक्ताओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। घरेलू सिलेंडर भी अब बेहद सीमित मात्रा में मिल पा रहे हैं।गैस एजेंसी संचालक हरगोविंद ने बताया कि, घरेलू एलपीजी की आपूर्ति तो किसी तरह सीमित रूप में की जा रही है, लेकिन कमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई पूरी तरह ठप है। नियमों के अनुसार शहरी क्षेत्र में 25 दिन और ग्रामीण में 45 दिन का अंतराल अनिवार्य है। कई उपभोक्ताओं की किताबें (कनेक्शन) इसलिए बंद हो गई हैं क्योंकि उन्होंने पिछले 9 महीनों से सिलेंडर नहीं लिया, वहीं बिना केवाईसी वाले उपभोक्ताओं को भी परेशानी आ रही है।

कोयले का सहारा: सेहत और स्वाद दोनों पर संकट

होटल एवं रेस्टोरेंट यूनियन के अध्यक्ष भगवत अग्रवाल ने बताया कि गैस न मिलने के कारण अब मजबूरी में आदिम युग की तरह कोयले और लकड़ी का सहारा लेना पड़ रहा है।

बढ़ती लागत: कोयले के उपयोग से खाना बनाने की लागत बढ़ गई है।

सीमित मेन्यू: गैस की कमी के कारण तवा रोटी, चाऊमीन और डोसा जैसे व्यंजन कई होटलों ने मेन्यू से हटा दिए हैं।

स्वास्थ्य पर असर: कोयले के धुएं से रसोई में काम करने वाले कर्मचारियों की सेहत बिगड़ रही है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुँच रहा है।